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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेन्च के फ़ैसले पर जलेस, प्रलेस और जसम का साझा बयान

बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेन्च के फ़ैसले पर जलेस, प्रलेस और जसम का साझा बयान
            रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच का फ़ैसला इस देश के हर इंसाफ़पसंद नागरिक के लिए दुख और चिंता का सबब है। इस फ़ैसले में न सिर्फ तथ्यों, सबूतों और समुचित न्यायिक प्रक्रिया की उपेक्षा हुई है, बल्कि धार्मिक आस्था को अदालती मान्यता देते हुए एक ऐसी नज़ीर पेश की गयी है जो भविष्य के लिए भी बेहद ख़तरनाक है। इस बात का कोई साक्ष्य न होते हुए भी, कि विवादित स्थल को हिंदू आबादी बहुत पहले से भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मानती आयी है, फ़ैसले में हिंदुओं की आस्था को एक प्रमुख आधार बनाया गया है। अगर इस आस्था की प्राचीनता के बेबुनियाद दावों को हम स्वीकार कर भी लें, तो इस सवाल से तो नहीं बचा जा सकता कि क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया ऐसी आस्थाओं से संचालित होगी या संवैधानिक उसूलों से? तब फिर उस हिंदू आस्था के साथ क्या सलूक करेंगे जिसका आदिस्रोत ऋग्वेद का ‘पुरुषसूक्त’ है और जिसके अनुसार ऊंच-नीच के संबंध में बंधे अलग-अलग वर्ण ब्रह्मा के अलग-अलग अंगों से निकले हैं और इसीलिए उनकी पारम्परिक ग़ैरबराबरी जायज़ है? अदालत इस मामले में भारतीय संविधान से निर्देशित होगी या आस्थाओं से? तब स्त्री के अधिकारों-कर्तव्यों से संबंधित परम्परागत मान्यताओं के साथ न्यायपालिका क्या सलूक करेगी? हमारी अदालतें सती प्रथा को हिंदू आस्था के साथ जोड़ कर देखेंगी या संविधानप्रदत्त अधिकारों की रोशनी में उस पर फ़ैसला देंगी? कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था को विवादित स्थल संबंधी अपने फ़ैसले का निर्णायक आधार बना कर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘मनुस्मृति’ और ‘पुरुषसूक्त’ समेत हिंदू आस्था के सभी स्रोतों को एक तरह की वैधता प्रदान की है, जिनके खि़लाफ़ संघर्ष आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण का एक अनिवार्य अंग रहा है और हमारे देश का संविधान उसी आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना की मूर्त अभिव्यक्ति है। इसलिए आस्था को ज़मीन की मिल्कियत तय करने का एक आधार बनाना संवैधानिक उसूलों के एकदम खि़लाफ़ है और इसमें आने वाले समय के लिए ख़तरनाक संदेश निहित हैं। ‘न्यायालय ने भी आस्था का अनुमोदन किया है’, ऐसा कहने वाले आर एस एस जैसे फासीवादी सांप्रदायिक संगठन की दूरदर्शी प्रसन्नता समझी जा सकती है!
           यह भी दुखद और चिंताजनक है कि विशेष खंडपीठ ने ए।एस.आई. की अत्यंत विवादास्पद रिपोर्ट के आधार पर मस्जिद से पहले हिंदू धर्मस्थल होने की बात को दो तिहाई बहुमत से मान्यता दी है। इस रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ‘स्तंभ आधारों’ के होने का दावा किया गया है, जिसे कई पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों ने सिरे से ख़ारिज किया है। यही नहीं, ए.एस.आई. की ही एक अन्य खुदाई रिपोर्ट में उस जगह पर सुर्खी और चूने के इस्तेमाल तथा जानवरों की हड्डियों जैसे पुरावशेषों के मिलने की बात कही गयी है, जो न सिर्फ दीर्घकालीन मुस्लिम उपस्थिति का प्रमाण है, बल्कि इस बात का भी प्रमाण है कि वहां कभी किसी मंदिर का अस्तित्व नहीं था। निस्संदेह, ए.एस.आई. के ही प्रतिसाक्ष्यों की ओर से आंखें मूंद कर और एक ऐसी रिपोर्ट परं पूरा यकीन कर जिसे उस अनुशासन के चोटी के विद्वान झूठ का पुलिंदा बताते हैं, इस फ़ैसले में अपेक्षित पारदर्शिता एवं तटस्थता का परिचय नहीं दिया गया है।
          हिंदू आस्था और विवादास्पद पुरातात्विक सर्वेक्षण के हवाले से यह फ़ैसला प्रकारांतर से उन दो कार्रवाइयों को वैधता भी प्रदान करता है जिनकी दो-टूक शब्दों में निंदा की जानी चाहिए थी। ये दो कार्रवाइयां हैं, 1949 में ताला तोड़ कर षड्यंत्रपूर्वक रामलला की मूर्ति का गुंबद के नीचे स्थापित किया जाना तथा 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना। आश्चर्य नहीं कि 1992 में साम्प्रदायिक ताक़तों ने जिस तरह कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं और 500 साल पुरानी एक ऐतिहासिक इमारत को न सिर्फ धूल में मिला दिया, बल्कि इस देश के आम भोलेभाले नागरिकों को दंगे की आग में भी झोंक दिया, उसके ऊपर यह फ़ैसला मौन है। इस फ़ैसले का निहितार्थ यह है कि 1949 में जिस जगह पर जबरन रामलला की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया, वह जायज़ तौर पर रामलला की ही ज़मीन थी और है, और 1992 में हिंदू सांप्रदायिक ताकतों द्वारा संगठित एक उन्मादी भीड़ ने जिस मस्जिद को धूल में मिला दिया, उसका ढहाया जाना उस स्थल के न्यायसंगत बंटवारे के लिए ज़रूरी था! हमारे समाज के आधुनिक विकास के लिए अंधविश्वास और रूढि़वादिता बड़े रोड़े हैं जिनका उन्मूलन करने के बजाय हमारी न्यायपालिका उन्हीं अंधविश्वासों और रूढि़वादिता को बढ़ावा दे तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है!
         लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच में यक़ीन करने वाले हम लेखक-संस्कृतिकर्मी, विशेष खंडपीठ के इस फ़ैसले को भारत के संवैधानिक मूल्यों पर एक आघात मानते हैं। हम मानते हैं कि अल्पसंख्यकों के भीतर कमतरी और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने वाले तथा साम्प्रदायिक ताक़तों का मनोबल ऊंचा करने वाले ऐसे फ़ैसले को, अदालत के सम्मान के नाम पर बहस के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। इसे व्यापक एवं सार्वजनिक बहस का विषय बनाना आज जनवाद तथा धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए सबसे ज़रूरी क़दम है।

हस्ताक्षरकर्ता मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
कमला प्रसाद, महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
मैनेजर पाण्डेय, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच
चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
आली जावेद, उप महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

जन संस्कृति मंच, लखनऊ की पत्रिका के ब्लॉग जसम लखनऊ से साभार।

रविवार, 8 अगस्त 2010

मुनि जी का अनर्गल प्रलाप ; क्या यह चुप्पी खतरनाक नहीं है।

          भोपाल में इन दिनों पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोग एक दिगम्बर मुनि के कड़वे प्रवचनों का आनन्द ले रहे हैं। वे दिगम्बर मुनि जब बैंडबाजे के साथ सड़क से गुज़रते हैं तो उनके अनुयाई महिला पुरुष तो श्रद्धा से सिर झुका लेते हैं मगर समाज के दूसरे वर्गों के लोगों को खासकर महिलाओं को परेशानी होती है या वे उन्हीं पागलों की तरह इन दिगम्बर मुनि जी को भी नज़रअन्दाज़ करती चलती हैं जो शहर में विक्षिप्त हालत में अपने बदन पर से कपड़े उतार फेंककर अक्सर यहाँ वहाँ घूमते दिखाई देते रहते हैं, यह एक प्रश्न है।
          एक सुसंस्कृत समाज में जहाँ भाँति भाँति के धर्म और सम्प्रदाय के लोग रहते हैं, महज़ धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर किसी को इस तरह सड़क पर निर्वस्त्र घूमने की इजाज़त दी जानी चाहिए या नहीं इस प्रश्न को उठाने से परहेज करते हुए इससे भी बड़ा एक प्रश्न उठाने की आवश्यकता महसूस हो रही है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी कुछ भी ऊटपटांग बोलने की इजाज़त दी जानी चाहिए या धार्मिक प्रवचनों की आड़ में किसी प्रकार की अविवेकपूर्ण बातों को बर्दाश्त किया जाना चाहिए ?
          मुनि जी कहते हैं कि विधानसभा में खतरनाक लोग होते हैं, यह बात सुनकर सरकार के मुखिया से लेकर सारे राजनीतिज्ञ मंद मंद मुस्कुराते हुए मुनि जी से आशीर्वाद लेने के लिए लाइन लगाकर खड़े रहते हैं, उनमें से किसी के चेहरे पर मुनि जी के इस जुमले से कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं देता। मुनि जी के कड़वे प्रवचन सुनने वाले प्रबुद्ध लोग भी इस बात से मंद मंद मुस्कुराकर रह जाते हैं, उनके चेहरे पर भी इस बात से कोई शिकन नहीं आती। ज़ाहिर है इस सत्य से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता मगर यह सत्य आम जनसाधारण के लिए कितना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसके कल्याण के लिए विधानसंभाएँ या संसद के ज़रिए प्रजातांत्रिक कर्त्तव्यों का निर्वहन किया जाता है। जब वहाँ खतरनाक लोग बैठे होंगे जिसका अर्थ है गुंडे, बदमाश, असामाजिक तत्व बैठे होंगे तो फिर आम जनता का क्या हश्र होगा यह समझा जा सकता है, मगर मुनि जी को इस संबंध में आगे कुछ नहीं कहना है।
          मुनि जी कहते हैं कि ’’अगर आप झुकना नहीं जानते तो फिर समझ लो की मुर्दा हो गए, क्योंकि मुर्दा ही ऐसा होता है जो कि झुकता नहीं।’’ अनुभवी लोग यही बात दूसरे अन्दाज़ में कहते हैं जब अंधड़ चलता है तो दूब-घास का कुछ नहीं बिगड़ता क्यों कि वह ज़मीन पर लेट जाती है परन्तु बड़े-बडे़ पेड़ जड़ से उखड़ जाते हैं। यहाँ घास के उदाहरण से जहाँ यह बात स्पष्ट होती है कि आंधी गुज़रते ही जिस तरह घास दोबारा उठ खड़ी होती है फिर उसी तरह तनकर खड़े हो जाओ, वहीं मुनि जी के प्रवचन से यह समझ में आता है कि-अन्याय अत्याचार के सामने झुकना सीखो, गुंडे-बदमाश, असामाजिक तत्व जब दबाने की कोशिश करे तो उनके सामने झुक जाओ, देश में इतना कुछ अनाचार, झूठ-फरेब चल रहा है उस सबके सामने झुक जाओ, वर्ना मुर्दा कहलाओगे।
          एक दिन वे कह रहे थे, ‘‘यह देश बदलने वाला नहीं है इसलिए बेहतर है तुम खुद ही बदल जाओं।’’ इसका भी यही अर्थ है कि इस देश में जो सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ वर्तमान में मौजूद है वे कभी बदलने वाली नहीं है इसलिए तुम भी उन परिस्थितियों के गुलाम हो जाओ, उनके अनुसार आचरण करो। इसका अर्थ यह भी होता है कि देश में जात-पात, धर्म सम्प्रदाय के नाम पर राष्ट्रीय हितों को ताक पर रख देते हैं, तुम भी रखो, एक दूसरे की गरदने काटते हैं तुम भी काटो, राजनीति में नीति नैतिकता की जो जर्जरता देखी जा रही है तुम भी उसी में लिप्त हो जाओ, आम जनता का खून चूसो, जिस तरह देश का पूँजीपति वर्ग आम जनता का आर्थिक शोषण कर रहा है तुम भी करों, सभी उत्कृष्ट मूल्यों को तिलांजलि देकर एक जानवर की तरह का जो आचरण आजकल जन मानस में देखा जा रहा है, तुम भी उसी तरह का आचरण अपना लो, आदि आदि।
          रोजाना वे दिगम्बर मुनि इस प्रकार की ऊटपटांग बातें करते रहते हैं और भी कई स्वयंभू गुरु इस तरह कि आधारहीन, अवैज्ञानिक बातों से पढ़े-लिखे लोगो तक को भरमाते रहते हैं, मगर सबसे ज्यादा ताज़्जुब की बात यह है कि देश के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, प्रगतिशील राजनैतिक पार्टियाँ, मानव अधिकार संगठन, महिला संगठन, और तमाम व्यक्तिगत एवं संस्थागत रूप से सामाजिक जद्दोजहद में लगे लोग इस विषय में चुप्पी साधे रहते हैं। क्या यह चुप्पी खतरनाक नहीं है।    

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

नक्सलवाद-खून किसी का भी बहे नुकसान देश का ही है

देश में पूँजीवादी शोषण, राजनैतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार, धर्माध साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गरीबी, बेरोजगारी और इससे उपजी अनैतिकता, लोभ-स्वार्थ जनित असामाजिक गतिविधियाँ, और भी ऐसे कई मुद्दों को दरकिनार करते हुए अभी कल ही चिदम्बरम ने नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा दुश्मन घोषित किया था कि आज छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने अब तक की सबसे बड़ी कार्यवाही को अंजाम देते हुए ‘पूँजीवादी स्टेट मशीनरी’ को भारी क्षति पहुँचाई है। देखा जाए तो देश में बदहाली की जिम्मेदार ‘स्टेट मशीनरी’ की रक्षा में लगे लाखों भारतीयों के मुकाबले महज़ पचहत्तर नौजवानों का क़त्लेआम संख्या के लिहाज़ से कोई खास मायने नहीं रखता लेकिन इस घटना का निहितार्थ बहुत गहरा है।
अभी कुछ ही महीनों पहले मध्यप्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री को उनके चुनाव क्षेत्र से टेलीफोन पर नक्सलियों के नाम से धमकी सी दी गई थी। मामला चूँकि मंत्री महोदय का था तो पुलिस ने अतिरिक्त तत्परता बरतते हुए धमकी देने वाले उन दो तथाकथित नक्सलियों को ढूँढ निकाला जो कि अपनी किसी व्यक्तिगत परेशानी में मुब्तिला, मंत्री महोदय के चुनाव क्षेत्र के अत्यंत दूरदराज के किसी गाँव के बच्चे निकले। बात आई-गई हो गई लेकिन इस घटना से यह खुलासा होता है कि सभी तरह के प्रतिबंधों के बावजूद भी नक्सल आन्दोलन मानसिक धरातल पर देश के कोने-कोने में जनमानस के बीच जा पहुँचा है। नक्सल आंदोलन का इतिहास, ध्येय, सोच-विचार, सिद्धांत, आदि-आदि कुछ भी पता ना होने के बावजूद, अन्याय के विरुद्ध एक उचित रास्ते के रूप नक्सलवाद जन-साधारण की चेतना में घर करता जा रहा है।
पूँजीवादी राज्य के लिए इससे बड़ी खतरे की घंटी दूसरी नहीं हो सकती। लेकिन सबसे दयनीय बात यह है कि सरकारें इससे निपटने के लिए ताकत के इस्तेमाल के अलावा दूसरा कोई विचार मन में नहीं लाना चाहती। आज सेना को छोड़कर, पुलिस-प्रशासन और जो कोई भी उपलब्ध पेरा मिलिट्री फोर्सेस हैं उनकी ताकत को नक्सलियों के खिलाफ इस्तेमाल कर स्टेट मशीनरी इस लघु गृहयुद्ध को जीतना चाहती हैं जो कि आयतन के रूप में लगातार बढ़ता चला जा रहा है। हो सकता है कल जब आस-पड़ोस के दुश्मनों से भी ज़्यादा बड़े ये दुश्मन हो जाएँ तो जल-थल-वायुसेना को भी अपने ही इन भारतीय भाइयों का खून बहाने के लिए तैनात कर दिया जाय। इसका अंतिम नतीजा जो हो सकता है वह यह कि देश के कोने-कोने नक्सल नाम का हर प्राणी ज़मीदोज़ कर दिया जाए, मगर चेतना में जो नक्सलवाद बैठा हुआ है उसका क्या होगा इसके बारे में सोचने की फुरसत किसी सरकार को नहीं है। देर-सबेर चेतना में बैठा नक्सलवाद फिर संगठित होकर सामने आएगा ही।
हम कई बार कई लोगों के मुँह से नक्सलियों की प्रशंसा सुनते रहते है, छोटे-मोटे अन्याय से परेशान होकर लोग सीधे नक्सली बनने की बातें करने लगते हैं। इससे बड़ी असफलता भारतीय राज्य की और कुछ नहीं हो सकती कि जिन लोगों को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बताया जा रहा है उन्हें आम जनसाधारण की बीच में सहानुभूति हासिल है। कल को जब नक्सल साहित्य के ज़रिए, जो अब तक पाबंदी के चलते बड़े पैमाने पर लोगों के बीच पहुँचा नहीं है, नक्सलियों की राजनैतिक विचारधारा का व्यापक प्रचार होगा तब स्थितियाँ और भी अलग होंगी।
पूँजीवादी स्टेट मशीनरी के लिए अब भी समय है कि वह अपने भी सुधार लाए। विगत बासठ वर्षों में देश की आम जनता के साथ हुए अन्याय का वास्तविक विष्लेषण किया जाए और जनविरोधी शासन-प्रशासन को अधिक प्रजातांत्रिक, जनवादी बनाया जाए। पूँजीवादी हितों को ताक पर रखते हुए रोटी, कपड़ा, मकान की आधारभूत ज़रूरतों की पूर्ति की जाए, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय को सुलभ बनाया जाए। समाज में स्वार्थ सिद्धी और नैतिक पतन की रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएँ। पूँजी का सैलाब जो आम जनसाधारण, व्यापक समाज के स्थान पर चंद पूँजीपतियों की तिज़ोरी की ओर बह रहा है, उसे रोका जाए।
कुल जमा बात यह है कि चाहे नक्सली हों या पेरा मिलिट्री फोर्सेस, दोनों ही पहले इस देश की आम जनता हैं। खून किसी का भी बहे नुकसान देश का ही है। इसलिए सरकारों को जाहिए कि अब वे पूँजीवाद और ग्लोबजाइजेशन के अंधड़ में खो गए परोपकारी राज्य की ओर वापस लौटने के बारे में गंभीरता से सोचें अन्यथा खून की नदियाँ बहने से नहीं रोकी जा सकेंगी।          

मंगलवार, 30 मार्च 2010

हवा में उड़ने वाले वानर देवता का जन्मदिन-अंध विश्वास इसी को कहते हैं

    आज हनुमान जयंती है। हनुमान जी एक ऐसे वानर देवता के रूप में जाने जाते हैं जो ना केवल हवा में उड़ लेते हैं बल्कि एक समूचा पहाड़ भी अपनी हथेली पर साध लेते हैं। वे ना केवल मनुष्यों की तरह बोलते हैं बल्कि गुस्से में आकर सूर्य नारायण तक को निगल लेते हैं। और भी ना जाने क्या क्या!
    असंभव कारनामों की ऐसी अनेक कथाओं की पृष्ठभूमि में जो महज़ कल्पनाओं के सहारे खड़े किये गए एक चरित्र का द्योतक है, हनुमान जी के प्रति अंध श्रद्धा-भक्ति का हमारे देश में चलन बहुत पुराना है, विज्ञान का यहाँ कोई काम ना तो पहले था और ना अब है। अब तो सारे तर्क ताक पर रखकर युवाओं में हनुमान जी की लोकप्रियता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है इससे आधुनिक शिक्षा में पनपे वैचारिक खोखलेपन का भी पर्दाफाश होता है।
    वानर, मानवों का पुरखा होने के बावजूद मानवों की तरह का सामाजिक रूप से उन्नत प्राणी नहीं हो सकता। मानव समाज में घुल-मिलकर कुछ आदतें ज़रूर सीख सकता है परन्तु मनुष्यों की तरह बातें नहीं कर सकता। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को मात देकर मात्र इच्छाशक्ति से उड़ने की क्षमता तो अब तक पृथ्वी के सबसे उन्नत जीव ‘मनुष्य’ तक में पैदा नहीं हुई है, तब एक वानर में यह शक्ति कैसे पैदा हो सकती है। इतनी तरक्की के बावजूद दुनिया में ऐसी कोई मशीन नहीं बनी है जो एक समूचे पहाड़ को उठाकर जस का तस दूसरे स्थान पर पहुँचा दे, तब कोई सीमित शक्ति वाला वानर कैसे यह काम कर सकता है।
    फिर, सूर्य को निगलना..............!!!!! पृथ्वी से कुई गुणा बड़ी एक ठोस संरचना को निगलना, जिसका ताप करोड़ों किलोमीटर दूर पृथ्वी पर 40-50 डिग्री तक पहुँचने के साथ ही साथ मनुष्यों और समस्त प्राणियों को हैरान परेशान कर देता है, दुनिया भर के वैज्ञानिक जिसके करीब तक पहुँचाने लायक धातु का विकास अभी तक नहीं कर पाए हैं, ऐसे भस्म कर देने वाले अग्नि पिंड को लड्डू की तरह निगल लिया जाना असंभव ही नहीं कल्पनातीत है। मगर यह भारत भूमि है......... यहाँ देवता प्राकृतिक नियम कायदों, सत्यों से ऊपर उठकर अतिप्राकृतिक शक्तियों के मालिक हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं। भारतीयों से यह अपेक्षित है कि वे श्रद्धा, आस्था के बीच में वैज्ञानिक तथ्यों को बिल्कुल भी ना लाएँ।
    वैज्ञानिक विकास के अभाव में प्रकृति की अबूझ पहेलियों से उलझे तत्कालीन मनुष्यों ने हज़ारों साल पहले, अपनी अनोखी कल्पनाओं के आधार पर जो काव्य, कथाएँ सृजित की थीं, उन्हें एक युग विशेष का साहित्य ना मानकर ईश्वरीय शक्ति के चमत्कार के रूप में जीवन भर अपने सीने से लगाए रखना, अंध-श्रद्धा अंध-भक्ति अंध-विश्वास इसी को तो कहते हैं।   

मंगलवार, 23 मार्च 2010

शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-3)-एक इंकलाब की भारी ज़रूरत है।

भाग-१ के लिए यहाँ क्लिक करें।
भाग-२ के लिए यहाँ क्लिक करें।
क्या इसी हिन्दुस्तान का चित्र आँखों में लिए हुए भगतसिंह फाँसी पर चढे थे? क्या उनकी कल्पना का हिन्दुस्तान ऐसा ही था? नहीं, बात ऐसी नहीं, भगतसिंह तो बहुत दूर की बात, हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन में अपनी जान की कुरबानी देने वाले किसी भी क्रांतिकारी का सपना हरगिज़ ऐसा नहीं रहा होगा। बल्कि गाँधी जी के नेतृत्व में जो लोग थे उन्होंने भी कभी भारतीय समाज का यह घिनौना सपना कभी नहीं देखा होगा। भगतसिंह का सपना था-‘‘अन्त में समाज की एक ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी प्रकार के हड़कम्प का भय ना हो, और जिसमें मजदूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए, और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूँजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्धार कर सकें।’’(भगतसिंह)। उनका सपना इस उद्धरण में झलकता है कि -‘‘ क्रांति, पूँजीवाद और वर्गभेदों तथा विशेष सुविधाओं की मौत की घंटी बजा देगी। आज विदेशी और भारतीय शोषण के क्रूर जुए के नीचे कराहते पसीना बहाते तथा भूखों मरते हुए करोड़ों लोगों के लिए वह हर्ष और सम्पन्नता लाएगी। वह देश को उसके पैरों पर खड़ा कर देगी। वह एक नई राज्य व्यवस्था को जन्म देगी। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मज़दूर वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित कर देगी और समाज की जोकों को राजनीतिक शक्ति के आसन से सदा के लिए च्युत कर देगी।’’(भगतसिंह)

ये शब्द हैं उस 23 साल के नौजवान के, कितने शक्तिशाली, कितने वज़नदार कितने साफ साफ......... और आज अपने आप को मार्क्सवादी कहने वाली, तथाकथित नामधारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ संसद के अन्दर बैठकर जनता के हितों को ताक पर रख वोटों की राजनीति कीचड़ में लिप्त होकर सौदेबाज़ी में मशगूल हैं। इतना ही नहीं आज ये सभी वामपंथी पार्टियाँ खुलेआम पूँजीपति वर्ग की दलाली पर उतर आई हैं।

बहरहाल, फांसी से पहले भगतसिंह ने कहा था-‘‘ मेरी शहादत हिन्दुस्तानी नौजवानों के भीतर आज़ादी की लौ जलाएगी..........।’’(भगतसिंह) आज के नौजवानों को देखकर लगता है कि कभी इन लोगों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के इन महान नौजवानों खुदीराम, भगतसिंह, सुभाष बोस, इनसे कुछ भी सीखने का ज़रा भी प्रयास किया है ? जिस देश के ये ओजस्वी नौजवान कभी पूरी दुनिया में हिन्दुस्तानी युवा वर्ग के प्रतीक हुआ करते थे, आज उस हिन्दुस्तान के नौजवान वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों, शोषण शासन के दुष्चक्र से बिल्कुल बेखबर घोर गैर जिम्मेदाराना तरीके से जीवन यापन किये चले जा रहे हैं। समाज के दुख दर्दों से उन्हें कुछ लेना देना नहीं , महान आदर्शो से उन्हें कोई मतलब नहीं। कुछ घोर असामाजिक हो गए हैं, कुछ कैरियरिस्टिक हो गए हैं, कुछ कुंठित होकर आत्महत्याएँ कर रहे हैं, कुछ ड्रग्स और नशीले पदार्थों के सेवन में अपनी जिन्दगी तबाह कर हरे हैं.......... न उन्हें भगतसिंह याद है ना भगतसिंह की यह बात -‘‘ जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर अपने हाथों में लेनी है उन्हें अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है। इसका जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। हम मानते हैं कि विद्यार्थी का मुख्य काम शिक्षा प्राप्त करना है उसे अपना सारा ध्यान इसी तरफ लगाना चाहिए लेकिन क्या देश के हालातों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना क्या विद्या में शामिल नहीं है ? अगर नहीं तो हम ऐसी विद्या को निरर्थक समझते हैं जो केवल क्लर्की के लिए ली जाए........।’’(भगतसिंह)

आज फिर भगतसिंह के इस आव्हान को याद करने की जरूरत है कि -‘‘ एक इंकलाब की भारी ज़रूरत है। वे पढ़े ज़रूर पढ़े। साथ ही राजनीति का ज्ञान भी हासिल करें और जब जरूरत हो मैदान में कूद पड़ें और ज़िन्दगियाँ इसी काम में लगा दें। अपनी जान इसी काम में दान कर दें। अन्यथा बचने का और कोई उपाय नज़र नहीं आता।’’(भगतसिंह)

आज फिर वह जरूरत आ पड़ी है, राजनीति में कूद पड़ने की ज़रूरत....... मगर राजनीति ऊँचे आदर्शों वाली अर्थात वर्तमान जर्जर समाज व्यवस्था को उखाड़ फेंककर नई समाज व्यवस्था कायम करने के संघर्ष की राजनीति, अर्थात क्रांतिकारी राजनीति ना कि घटिया संसदीय चुनावी राजनीति।

‍‍-समाप्त-

शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-2)-जिसके लिए असंख्य कुरबानियाँ दी गई वह आज़ादी कैसी है.........

 भाग-१ के लिए यहाँ क्लिक करें।
यह बात आज सच साबित हो रही है । आज के हिन्दुस्तान की सामाजिक परिस्थिति देखने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 1 अरब से भी ज़्यादा आबादी में 95 प्रतिशत जनता बुरी तरह से 5 प्रतिशत शोषकों की शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। चाहे कोई पढ़ा लिखा हो चाहे अनपढ़ औद्योगिक मजदूर हो चाहे सड़क पर देहाड़ी करने वाला मज़दूर, चाहे वह कृषि मज़दूर हो या छोटा किसान, चाहे वह सरकारी कर्मचारी हो या गैरसरकारी, स्त्री हो, पुरुष हो, छात्र हो, नौजवान हो या बच्चा, यहाँ तक कि किसी माँ के पेट में पलता हुआ अपरिपक्व भ्रूण........ इस हिन्दुस्तान के अन्दर हर एक व्यक्ति बुरी तरह से पूँजीवादी शोषण का शिकार है। हर एक के एकदम बुनियादी अधिकारों के ऊपर शोषक वर्ग ने नाना तरीके से आक्रमण कर उसे वंचित कर रखा हुआ है। जहाँ दिन पर दिन गरीबी की रेखा के नीचे जनता का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, बेरोज़गारी का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, महँगाई बढ़ती ही जा रही है। सभी को शिक्षा की कोई व्यवस्था पहले ही नहीं थी, अब शिक्षा के निजीकरण के ज़रिए आम जनता के शिक्षा के अधिकार को संकुचित कर दिया जा रहा है। गरीबों के लिए चिकित्सा की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं, जहाँ विश्व भर में साइंस और टेक्नालॉजी उन्नत से उन्नत होती चली जा रही है, हिन्दुस्तान में मामूली सी बीमारी से आदमी मर जाता है। भीषण कुपोषण जिसके चलते जन्म दर कम होती चली जा रही है, मृत्युदर बढ़ती चली जा रही है।

लगातार लिए जा रहे कर्ज़ों का बोझ जनता के कंधों पर अनिवार्य जुए की तरह लदा हुआ है। बाहर से पैसा आता है विकास योजनाओं के लिए और तिजोरियाँ भरती चली जाती है हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग की। इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिन टाटा-बिड़ला की संपति आज़ादी के पहले मात्र कुछ करोड़ थी और अम्बानी जैसे पूँजीपति परिदृष्य में ही नहीं थे वहाँ आज कोई चार-पाँच सौ घराने देश की अकूत सम्पदा का उपभोग कर रहे हैं। जिस पूँजी को देश के औद्योगिक विकास में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के कृषि के आधुनिकीकरण में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के भीतर फिजूल नष्ट हो रही श्रम शक्ति के उपयोग और आम जनता के रोज़गार की व्यवस्था के लिए लगना चाहिए, वह मात्र कुछ घरानों की तिजोरी में कैद पड़ी हुई है, बल्कि भारतीय आम जनता का पर्याप्त शोषण करने के बाद अब वह देश की सीमाएँ लाँधकर दूसरे देशों की जनता के श्रम का शोषण करने भी पहुँच गई है। मतलब जो काम ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने यहाँ भारत में आकर किया, वही भारतीय पूँजीपति भी कर रहे हैं, यानी भारतीय पूँजीपति वर्ग भी साम्राज्यवाद का चरित्र अख्तियार कर चुका है..........।

सम्पूर्ण देश में नौकरशाही, हाथी के रूप में पाल छोड़ी गई है जो कि हिंसक एवं आदमखोर हो चुकी है। जाने कितने सारे आर्थिक घोटाले देश की जनता की कीमत पर खुले आम हो रहे हैं। लगातार नये नये टेक्सों को जबरदस्ती जनता के ऊपर लादकर दिन पर दिन उसकी कमर तोड़ी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सरकारें दिन पर दिन नए नए कानून अध्यादेश लागू कर देश की आम जनता की बुनियादी अधिकारों को भी छीने ले रही है, जिसमें से हर एक अधिकार मेहनतकश जनता ने काफी संघर्ष के बाद हासिल किया है।

देश भर में साम्प्रदायिक उन्माद की लहर व्याप्त है। जातीयता, प्रांतीयता, भाषा के झगड़े आदि आम बात हो गए हैं। साम्प्रदायिक संगठन हज़ारों की तादात में युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। और यह सब कुछ हो रहा है महज वोटों की राजनीति के चलते जिस राजनीति का काम है कि पूँजीपतियों के इस या उस खेमें के स्वार्थ की रक्षा करना, आम जनता के शोषण के लिए इस या उस घराने के लिए यथा सम्भव रास्ते खोलना।

निरन्तर भाग-३, दोपहर २ बजे।

शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-1)-ये आज़ादी-ब्रिटिश साम्राज्यवाद और हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग के साथ महज़ एक समझौता।

फिर वह काला दिन आ गया है जिस दिन हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा के प्रमुख प्रतिनिधि योद्धा शहीदेआज़म भगतसिंह को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर पंजों ने हमसे छीन लिया था। यूँ तो ब्रिटिश शोषण-शासन के शिकार हिन्दुस्तान के हज़ारों नौजवान देशप्रेमी हुए थे, परन्तु उन सबमें से भगतसिंह ही ऐसे नौजवान रहे जो आज इतने साल बाद भी अपनी शहादत के लिए शिद्दत से याद किए जाते हैं, और बहुत साफ है कि इसका प्रमुख कारण वह विचारधारा, वह आदर्श है जिसको अपने मजबूत नैतिकता-बोध की वजह से एक मात्र सही विचारधारा मानने हुए बेहद कच्ची उम्र में ही भगत सिंह ने स्वाभाविक रूप से अपना लिया था, जबकि वे जानते थे कि उस वक्त की खास राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में वह विचारधारा अपनाने का मतलब सर पर कफन बांधे चलना और अपने प्राण तक गँवाना था।

उस वक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक रूप से पूंजीवादी, साम्राज्यवादी देशों की स्थिति बहुत ही खराब थी। पूरा पूँजीवादी साम्राज्यवादी तबका सोवियत रूस की सर्वहारा क्रांति के असर से आतंकित था। कई छोटे मोटे देशों में धड़ाधड़ क्रांतियाँ हो रही थीं। एक साम्राज्यवादी ताकत होने के कारण ब्रिटिश सरकार की स्थिति भी इसी वजह से उन दिनों बहुत नाज़ुक हो गई थी। इस स्थिति में 18-20 साल की उम्र के नौजवान भगतसिंह, शोषित पीड़ित जनता की मुक्ति के एक मात्र विज्ञान ‘मार्क्सवाद’ को अपना आदर्श मानकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सर्वहारा क्रांति की दिशा देना चाहते थे। उनका विश्वास था कि ‘‘महान आदर्श के मूर्त रूप होने का स्वप्न संजोने वाले सभी तरुणों को जेल में डालकर भी क्रांति के बढ़ते हुए कदमों को नहीं रोका जा सकता।’’(भगतसिंह)

दूसरे देशों की क्रांतियों से उनका यह विश्वास और भी ज़्यादा दृढ हुआ था -‘‘ फ्रांस के क्रूरतम कानून और बड़ी बड़ी जेलें भी क्रांतिकारी आन्दोलन को दबा नहीं सकीं। मृत्युदंड के वीभत्स तरीके और साइबेरिया की खदानें भी रूसी क्रांति को रोक नहीं सकीं, तब क्या ये अध्यादेश और सुरक्षा अधिनियम भारत में आज़ादी की लौ बुझा पाएंगे?’’(भगतसिंह)

शोषक वर्ग के प्रति उनका सोचना एकदम स्पष्ट था। वे यह जानते थे कि हिन्दुस्तान से ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकना ही हिन्दुस्तानी आम आदमी की मुक्ति के लिए काफी नहीं है। उन्होंने कहा था कि -‘‘भारतीय मुक्ति संग्राम तब तक चलता रहेगा जब तक मुट्ठी भर शोषक लोग अपने फायदे के लिए आम जनता के श्रम को शोषण करते रहेंगे। शोषक चाहे ब्रिटिश हों या भारतीय।’’(भगतसिंह)। मतलब वे यह अच्छी तरह जानते थे कि भारत में आम जनता के शोषण में भारतीय पूंजीपति वर्ग भी शामिल है, और गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस जिस तरह की आज़ादी चाहती थी वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग के साथ महज़ एक समझौता साबित होगी, और उससे हिन्दुस्तान की आम जनता, शोषित पीड़ित मजदूर वर्ग की मुक्ति कभी भी नहीं हो सकेगी।

निरन्तर भाग-२, दोपहर १२ बजे।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

अनुसूचित जाति के ताकतवर लोगों पर विशेष नज़र रखने की ज़रूरत है

यह सच है कि अनुसूचित जातियों-जनजातियों के अधिकारों की रक्षा के लिये सरकारी स्तरों पर कड़े कानून होने के बावजूद देश भर में उनपर अगड़ी जाति के प्रभावशाली लोगों के अत्याचार बदस्तूर जारी हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से देश में इन जातियों के लिये उपलब्ध आरक्षण की व्यवस्था का लाभ लेकर आगे आए इन पिछड़ों में प्रशासनिक स्तर पर कई ऐसे अधिकारियों की फौज खड़ी हो गई है जो उनके पक्ष में कानून की कड़ाई का लाभ लेकर ऐसी कारस्तानियाँ कर रही है जिससे अनुसूचित जाति के लोगों के प्रति गैर अनुसूचितों की घृणा और भड़क रही है।
बहुत से लोगों के मुँह से ऐसे कई किस्से सुनने को मिलते हैं जिसमें गैर अनुसूचित वर्ग के लोगों को अनुसूचित वर्ग के प्रभावशाली लोगों से घोर प्रताड़ना और अत्याचार का शिकार होना पड़ा क्योंकि इन लोगों का यह मानना है कि युगों-युगों से उँची जातियों ने हमारा शोषण किया है, अब हमारी बारी है।
शासकीय सेवाओं में कई ऐसे अनुसूचित वर्ग के अधिकारी हैं जो अपने अधिनस्थ सामान्य वर्ग के कर्मचारियों-अधिकारियों को विशेषकर ‘ब्राम्हण’ वर्ग के लोगों को किसी ना किसी चक्रव्यूह में फँसाकर अपने पाँव छुलवाने में प्रचंड आनंद और आत्मसंतुष्टी पाते हैं। प्रशासन में ऐसे भी कई अनुसूचित वर्ग के अधिकारी हैं जो एक अभियान की तरह दूसरे वर्गों के अधिकारियों/कर्मचारियों को मौका-बेमौका सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। कुछ तो दमन और अत्याचार का ऐसा दुष्चक्र चलाते हैं कि भारी असंतोष और कुंठा के कारण उनके अधिनस्थ्ज्ञ सामान्य वर्ग वालों का जीवन दूभर हो जाता है। प्रश्न है कि क्या अनुसूचित जातियों जनजातियों को आरक्षण-सरंक्षण का लाभ क्या इसलिए दिया गया है कि वे शोषण और अत्याचार का एक नया अध्याय रचें ?
लाचारी यह है कि अनुसूचित वर्ग के बदमिजाज़ अफसरों के खिलाफ शिकायत होने के बावजूद उनके खिलाफ त्वरित कार्यवाही करने का कोई रास्ता नहीं है क्योंकि उनके मामलों में सात गलतियाँ बाकायदा माफ की जाती हैं और ढीढ अफसरों के औसान और बढ़ते जाते हैं। संविधान का मूल स्वर यदि समानता है तो किसी को भी ऐसे अत्याचार, दमन और अपमान की छूट नहीं दी जानी चाहिये चाहे वह सामान्य वर्ग के लोग हो या अनुसूचित वर्ग के।
भारतीय समाज में जाति प्रथा का बोलबाला होने के कारण ऊँची जाति के कई लोग अब भी तथाकथित निचली जातियों के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त हैं और अपने कुविचारों से वे मौका बेमौका अनुसूचित जाति के लोगों को आहत करते रहते हैं, मगर अनुसूचित वर्गों के प्रति सद्भाव रखने वाले, उन्हें समानता का दर्जा देने वाले गैर अनुसूचित वर्गों के प्रगतिशील लोगों को भी यदि बदले की भावना से ग्रस्त अनुसूचित वर्गों के लोगों से डरे रहकर, भय और आतंक के साए में जीना पड़े तो फिर अनुसूचित वर्गों को दिये गये विशेषाधिकारों के बारे में एक बार फिर से सोचने की आवश्यकता प्रतीत होती है।
देश भर में यह देखा जाता है कि स्वार्थ पूरा ना होने पर अनुसूचित जाति के लोग सामान्य वर्ग के लोगों पर अत्याचार का आरोप लगाकर अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट में फंसाने से भी नहीं चूकते। ऐसी स्थिति में ताकतवर हो गये अनुसूचित जाति के लोगों पर विशेष नज़र रखने की ज़रूरत है ताकि वे बिना बात किसी को परेशान करने से बाज आएँ। हाँ, इसके साथ ही अनुसूचित जातियों के प्रति घृणा का भाव रखने वालों की भी, व्यापक सामाजिक आंदोलन और कानून के माध्यम से लगाम कसे रखने की आवश्यकता तो है ही।


सोमवार, 18 जनवरी 2010

कामरेड बसु केसरिया सलाम


हालाँकि यह उपयुक्त मौका नहीं है कि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना की जाए परन्तु जब देखा जाता है कि सारी पार्टियाँ, पूँजीवादी अखबार और तमाम ब्लॉगर बुद्धिजीवी तक एक स्वर में कह रहे हैं कि ‘‘साम्यवाद का स्तंभ ढह गया’’ तब मजबूर होकर इस मामले में अपनी राय ज़ाहिर करना पड़ रही है। साम्यवादी आन्दोलन की हालत आज किसी से छुपी नहीं है। पूँजीवादियों से ज़्यादा साम्यवादी विचार और आन्दोलन को यदि किसी ने नुकसान पहुँचाया है तो देश की कम्युनिस्ट पार्टियों ने और इसके लिए सबसे ज़्यादा अगर कोई जिम्मेदार है तो वह ज्योतिबाबू की पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी।

बहुत ही अफसोस की बात है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लम्बे शासन काल में जब यह मूल दिशा से पथभ्रष्ट होकर पूँजीवादियों के हाथ का खिलौना बनती चली गई, सर्वाधिक समय के लिए ज्योतिबाबू ही पश्चिम बंगाल में सत्ता के मुखिया रहे, और यही वह समय रहा जब पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के गुंडों ने प्रदेश की आम जनता का जीना हराम किया। प्रदेश में गरीबी, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार आदि का तांडव भी खूब चला, अब भी चल रहा है। आज भी यह तथ्य मौजू है कि देश में कहीं भी अगर वेश्यावृति सबसे ज़्यादा पाई जाती है तो वह है पश्चिम बंगाल।
यह एक बेहद आश्चर्य की बात है कि जिस राज्य में विगत कई वर्षों से दूसरी कोई राजनैतिक पार्टी अपनी जगह तक नहीं बना पाई, जिस राज्य को साम्यवादी विचारधारा एवं आंदोलन के प्रचारप्रसार के लिए सुविधा के रूप में एक पूरे राज्य की मशीनरी उपलब्ध थी वहाँ पूँजीवादी बुराइयों का घर आखिर कैसे बन पाया ? एक पूरे राज्य की सत्ता की मशीनरी के उपयोग के बावजूद मार्क्सवादी आन्दोलन मात्र तीन राज्यों में ही क्यों पैर पसार पाया। बाकी राज्यों में क्यों मार्क्सवादी पार्टी का सांगठनिक ढॉचा बेहद कमज़ोर स्थिति में रहा। वस्तुगत परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में इन सब प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वास्तव में अगर किसी व्यक्ति को जवाबदेह होना चाहिये था तो, सत्ता-संगठन के अत्यंत नज़दीक होने के कारण वे ज्योतिबाबू ही हो सकते थे, जो अब इस दुनिया में नहीं है। कोई कह सकता है कि यह सवाल तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलिट ब्यूरो से पूछा जाना चाहिए, मगर हमारा कहना है कि, पोलिट ब्यूरो ही यदि वर्ग चेतना से लैस होता तो ना ज्योतिबाबू पोलिट ब्यूरो पर हावी हो पाते और ना पोलिट ब्यूरो साम्यवाद की अर्थी निकलती देखकर भी मूक दर्शक बना रहता।
दरअसल ज्योतिबाबू समेत पूरी मार्क्सवादी पार्टी इस मुगालते में रही कि एक ऐसा पूँजीवादी संस्थान ‘संसद’, जिसे पूँजीवाद ने अपने स्वार्थ को साधने के लिए एक हथियार के रूप में ईजाद किया था, उस हथियार पर काबिज होकर वे सर्वहारा, मजदूर वर्ग का भला कर लेंगे। ज्योतिबाबू के नेतृत्व का सम्पूर्ण काल यह साबित करता है कि मार्क्सवादी पार्टी के सारे धुरंधर मिलकर भी इस पूँजीवादी हथियार को सर्वहारा के पक्ष में उपयोग नहीं कर पाए, परन्तु पूँजीवादी शक्तियों ने, पहले से ही गलत बुनियाद पर खड़ी, सम्पूर्ण मार्क्सवादी पार्टी का वर्ग चरित्र बदलकर उसे पूरी तौर पर अपने पक्ष में उपयोग करने में एकतरफा सफलता पाई। अगर ऐसा नहीं होता तो ज्योतिबाबू का स्वयं का पुत्र इस पूँजीवादी व्यवस्था का लाभ उठाने वाला उद्योगपति नहीं होता और उनकी पार्टी के सबसे बड़े प्रशंसक ‘‘रतन टाटा’’ नहीं होते जिन्होंने सिंगुर में सारी दुनिया के सामने ज्योतिबाबू की पार्टी को अपना बंधुआ मजदूर बनाकर उपयोग कर लिया। दरअसल सिंगुर में बेशर्मी से पूँजीवाद की गोद में बैठकर आम जनता पर गोलियाँ चलवाने वाले वीर तो थे वर्तमान मुख्यमंत्री ‘बुद्धदेव’ मगर पतित सत्ता के वर्ग चरित्र के साथ संगठन के वर्ग चरित्र के निम्नतम स्तर तक पतन के दौरान मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लम्बे समय तक काबिज़ ज्योतिबाबू ही थे। दुनिया भर के पूँजीपतियों को आमंत्रित कर पश्चिम बंगाल उनके हवाले कर देने की कवायद ज्योतिबाबू के नेतृत्व में प्रारंभ हुई जिसका कारण मार्क्सवादी सोच-विचार से ज़्यादा पूँजीवादी सरोकारों को सलाम करना है।
ज्योतिबाबू के निधन पर आज चारों ओर वही जय-जयकार मची है जो किसी पूँजीवादी नेता के दिवंगत होने पर मचती है। यहाँ तक कि संघ के निर्देशों-आदेशों पर चलने वाली मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी उनके गम में एक दिन का राजकीय शोक मना रही है। संघ का इस मामले में रुख क्या होगा यह तो पता नहीं परन्तु कट्टर कम्युनिस्ट विरोधियों का यह व्यवहार आश्चर्यचकित कर रहा है। ज्योतिबाबू अगर सचमुच मार्क्सवादी विचारधारा के सच्चे वाहक होते तो संघ और भाजपा खेमे में पटाखे भले ना फूटते मगर यह राजकीय शोक का कार्यक्रम भी शायद नहीं होता जिसे देखकर ऐसा लग रहा है मानो भगवा बिग्रेड उनके सम्मान में नारे लगा रही हो ‘‘कामरेड बसु केसरिया सलाम’’।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है


सहस्त्राब्दि का सबसे लम्बा सूर्यग्रहण सम्पन्न हुआ । एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के हम प्रत्यक्षदर्शी बने मगर इसके साथ ही साथ बड़े पैमाने पर तर्कविहीन, रूढ़ीवादी, अवैज्ञानिक अंधविश्वास जनित कार्यव्यापार के भी मूक दर्शक बने, जैसे कि हमेशा ही ऐसी घटनाओं के समय बनते आएँ हैं। जब भी कोई इस प्रकार की घटना घटित होती है हमें भारतीय समाज की दुर्दशा का मार्मिक नज़ारा देखने को मिलता है, जब अनपढ़ तो अनपढ़, समाज को आगे ले जाने के लिए जिम्मेदार पढे़-लिखे लोग भी अपनी तर्कशक्ति को ताक पर रखकर बुद्धिहीनों की तरह आचरण करने लगते हैं। हज़ारों-लाखों लोगों के इस प्रकार कठपुतलियों की तरह व्यवहार करते देख उनकी तुलना उन पशु-पक्षियों से करने को मन करता है जो सूर्यग्रहण के अंधकार से भ्रमित होकर अपने नीड़ों को लौटने लगते हैं, या जिस प्रकार गाय-बकरियाँ शाम होने के भ्रम में वापस घर लौटने लगतीं हैं। ज्ञान-विज्ञान के अभाव में उनका यह आचरण आश्चर्य पैदा नहीं करता लेकिन पढ़े लिखे मनुष्यों के पास प्रकृति से संबंधित अंधिकांश ज्ञान उपलब्ध होने के बावजूद ऐसा व्यवहार आश्चर्य के साथ-साथ दुखी भी करता है।


हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान से लैस होने के लिए अपना मूल्यवान समय तो ज़ाया किया है परन्तु उसका उपयोग करने का जज़्बा उनमें पैदा ही नहीं हो सका। ऐसे लाखों लोग हमेशा की तरह सूर्यग्रहण का तथाकथित सूतक शुरू होते ही सारी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाकर घर में दुबक कर बैठ गए। सूर्यग्रहण शुरू होते ही खाना-पीना प्रतिबंधित कर व्रत सा धारण कर लिया और कुछ लोग सभी खाने-पीने के पदार्थों में तुलसी पत्ता डालकर उन्हें किसी अज्ञात दुष्प्रभाव से बचाने की कवायद में लग गए। सूर्यग्रहण समाप्त होने पर तथाकथित मोक्ष की बेला में बीमार कर देने वाले बर्फीले ठंडे नदियों-तालाबों के पानी में उतरकर पवित्र होने के विचित्र भाव से आल्हादित होने लगे। मंदिरों में एकत्रित हो मूर्तियों के सामने नतमस्तक होकर संकट से उबारने के लिए की गुहार लगाने वाले सीधे-साधे अशिक्षित ग्रामीणों की बात अलग है, परन्तु यहीं सब करते हुए जब पढ़े-लिखे लोगों की जमात को देखना पड़ता है तो हमारे समाज के एक दुखद पहलू का सामना करते हुए बरबस आँखों में आँसू आ जाते हैं। पढ़े-लिखों का दयनीय चेहरा तब और सामने आने लगता है जब वे अपने इन तमाम अंधविश्वासी कृत्यों को उचित ठहराने के लिए इस अंधाचरण पर स्वरचित अवैज्ञानिक अवधारणाओं का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करने लगते हैं।

दरअसल यह पूरी तरह से राज्य का विषय है। ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के इस दौर में किसी भी राज्य की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकाले। रूढ़ीवाद, अंधविश्वास एवं अंधतापूर्ण आचरण पर अंकुश लगाए, उन्हें वैज्ञानिक विचारधारा से लैस करे, लेकिन देखने में आता है कि इन सब मसलों पर राज्य की भूमिका एकदम निराशाजनक होती है। निराशाजनक शब्द शायद ठीक नहीं है.......राज्य की बागडोर अगर अंधविश्वासी, कूपमंडूक लोगों के हाथों में हो तो क्या उम्मीद की जा सकती है। राज्य के वर्ग चरित्र को देखकर यह कहा जा सकता है कि राज्य जनमानस के बीच अंधविश्वासों, रूढ़ीवाद, अवैज्ञानिक चिंतन को पालने-पोसने बढ़ावा देने में लगा हुआ है, तभी सूर्यग्रहण जैसी महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के बारे में ज्ञानवर्धन की कवायद करने की बजाय किसी अज्ञात भय संकट के वातावरण का सृजन करते हुए स्कूल-कालेजों के बच्चों को छुट्टी दे दी जाती है।

हमारा मानना है कि खगोल विज्ञान वह महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसका समुचित और सही-सही ज्ञान मानव समाज को सत्य की खोज की भटकन से मुक्त कर सही दिशा सही रास्ते की ओर उन्मुख करता है जो कि बेहद जरूरी है। विषेशकर इस स्थिति में जब आज भी पृथ्वी को शेषनाग के फन पर रखी होने की गप्प पर विश्वास करने वालों और सूर्यग्रहण को ईश्वरीय प्रकोप मानने वालों की हमारे देश में कोई कमी नहीं है। पृथ्वी, ब्रम्हांड, एवं मानव समाज की समस्त गतिविधियों को संचालित करने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है, वर्ना सूर्यग्रहण-चन्द्रगहण पर उपवास कर संकट से मुक्ति की कामना करने वाले पढ़े-लिखों की संख्या बढ़ती ही रहेगी और भारतीय समाज कभी भी अज्ञान के अंधकार से मुक्त नहीं हो पाएगा।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

क्रिसमस प्रसंग-धर्म को कूडे़दान में डाल दो.......


दुनिया भर में धार्मिक कपोल कल्पनाओं का कोई अन्त नहीं है। उन्हीं में से एक है ईसा मसीह का जन्म। आज 25 दिसम्बर को सारी दुनिया के ईसाई लोग मध्ययुग के एक तथाकथित ईश्वर-अवतार ईसा मसीह का जन्मदिन बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं, जिनका जन्म स्त्री-पुरुष के दैहिक संसर्ग, गर्भधारण, प्रसव इत्यादि तमाम अनिवार्यताओं से मुक्त ईश्वर के आशीर्वाद मात्र से हुआ था। कहने की ज़रूरत नहीं कि वर्जिन मेरी की तरह ही आज भी हमारे देश में कई कुँवारी माताएँ (अवैध यौनाचार, बलात्कार इत्यादि की शिकार होकर) नवजात शिशुओं को जन्म देती हैं, परन्तु उनमें से अधिकांश कचरे के ढेर पर डले मिलते हैं या गला घोटकर नाले में फेंक दिये जाते हैं। आज यदि किसी ऐसे बच्चे को ईश्वर का अवतार प्रचारित किया जाए तो हम में से कोई यह मानने का तैयार नहीं होगा।

आज के इस वैज्ञानिक युग में भी करोड़ों लोग ना केवल ईसामसीह के जन्म से जुड़ी इस झूठी कहानी पर विश्वास करते हैं बल्कि दुनिया के उद्भव के संबंध में बायबल में उल्लेखित भ्रामक और कल्पित अवधारणाओं को, अथक परिश्रम एवं संघर्षों से हासिल की गई वैज्ञानिक उपलब्धियों के ऊपर तरजीह देते हैं। करोड़ों वर्षों की प्रकृति, जीव जगत व मानव समाज की विकास यात्रा के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई इस दुनिया के निर्माण की, बायबल में उल्लेखित सात दिवसीय कहानी पर आज भी जब दुनिया के कई पढ़-लिखे विद्वानों को विश्वास व्यक्त करते हुए देखा जाता है तो आश्चर्य ही नहीं दया भी आती है।

इस ईसाई धार्मिक अन्धता, जिसका विरोध करते हुए योरोप में वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न कई दार्शनिकों ने अपनी जान गँवाई है, को नज़रअन्दाज करते हुए यदि तत्कालीन परिस्थितियों पर नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि ईसामसीह एक ऐसे दौर में जननेता के रूप में उभरकर आए व्यक्तित्व थे जब तत्कालीन मध्ययुगीन कबीलाई समाज बेहद अराजक ढंग से जीवनयापन करता था, और बहुईश्वरवाद से ग्रस्त एक दूसरे के खून का प्यासा हुआ करता था। ईसा मसीह ने एकेश्वरवाद के विचार को इन अराजक लोगों में रोपते हुए तमाम कबीलों को एकजुट किया और ईश्वर की कल्पना के इर्दगिर्द एक विशेश नीति-नैतिकता में बाँधना प्रारंभ किया, कालान्तर में जिसे ईसाई धर्म के रूप में आत्मसात किया गया। विज्ञान एवं दर्शन के विकास के अभाव में इससे बड़ी सामाजिक गतिविधि की उम्मीद उस युग में नहीं की जा सकती थी। परन्तु, आज के युग में जब विज्ञान अपने चरम पर है, ना केवल ईसाई धर्म के अनुयाइयों की अंधभक्ति आश्चर्य पैदा करती है बल्कि इसके विभिन्न धड़ों, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट इत्यादि-इत्यादि का आपसी मतभेद एवं वैमनस्य भी हतप्रभ करता है। जिस ईसा मसीह ने तत्कालीन कबीलाई समाज को संगठित किया आधुनिक ईसाइयों ने उसे कई हिस्सों में बाँट लिया और वे सब बेशर्मी से ईसामसीह के जन्मदिन की खुशियाँ भी मनाते हैं।

कोई भी धर्म एक समय विशेष में अपना काम सम्पन्न करने के पश्चात अप्रासंगिक हो जाता है। ज्ञान-विज्ञान की सच्चाइयों को नज़रअन्दाज करके धार्मिक कार्यवाहियों के ज़रिए पुरानी लकीर को पीटते रहना दरअसल जाने-अन्जाने समाज को पीछे खीचना ही है जो कि मानव समाज के लिए बेहद घातक है। इस सच्चाई को ईसाई धर्म ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के अनुयाइयों को समझने की ज़रूरत है। धर्म को दरअसल कूड़ेदान में डाल देने की ज़रूरत है ताकि एक बेहतर मानव समाज बनाया जा सके।


गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

पूर्वजन्म की यादों के बहाने अंधविश्वास की बकवास

आजकल टी.वी पर एक धारावाहिक के ज़रिए देश के एक सदियों पुराने अंधविश्वास को भुनाकर पैसा कमाने की जुगत चल रही है। पूर्वजन्म की यादों को वापस लाने के निहायत अवैज्ञानिक, झूठे और आडंबरपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए लोगों में इस बचकाने अंधविश्वास को और गहरे तक पैठाने की कोशिश की जा रही है। यह कहना तो बेहद मूर्खतापूर्ण होगा कि आम जनता में गहराई तक मार करने वाले एक महत्वपूर्ण मीडिया पर ऐसे अवैज्ञानिक कार्यक्रमों को प्रसारित करने की अनुमति आखिर कैसे दे दी जाती है ! यह मामला नियम-कानून, और सांस्कृतिक-सामाजिक नीतियाँ बनाने वालों की मूढ़ता का भी नहीं है। दरअसल यह तो एक सोचे-समझे ब्रेनड्रेन कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसमें षड़यंत्रपूर्वक आम जन साधारण में वैचारिक अंधता पैदा करने, समझदारी और तर्कशक्ति को कुंद कर देने की जनविरोधी कार्यवाही अंजाम दी जाती है, ताकि लोगों का ध्यान देश की मूल समस्याओं की ओर से हटाया जा सके।
पूर्वजन्म और इसके मनगढन्त किस्सों पर इन दिनों पढ़े-लिखे, विज्ञान की शिक्षा हासिल किए, समझदार लोग भी ना केवल आँख मूँदकर विश्वास करते हैं, बल्कि इस रहस्यपूर्ण मामले को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की बजाय मूर्खतापूर्ण तरीके से यह समझाने की कोशिश करने लगते हैं कि ‘‘आजकल विज्ञान भी इसे मानता है’’। इसी से पता चलता है कि विज्ञान के प्रति भी लोगों में किस कदर गलत और भ्रामक समझकारी का बोल-बाला है, जो कि हमारे समुचित सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के रास्ते में बहुत बड़ा रोड़ा है।
जीव विज्ञान के अनुसार ‘याददाश्त’ एक गूढ सरंचना वाले पदार्थ ‘मस्तिष्क’ का एक विशेष गुण होता है जो कि मानव शरीर के खात्मे के साथ ही समाप्त हो जाता है। दुनिया भर में मृत्यु के बाद मृत शरीर को भिन्न-भिन्न तरीकों से नष्ट कर दिया जाता है, इसके साथ ही मस्तिष्क नाम के उस ‘पदार्थ’ का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जब याददाश्त को संचित रखने वाला मूल पदार्थ ही नष्ट हो जाता है (हिन्दुओं में दाह-संस्कार में वह राख में तब्दील हो जाता है) तो फिर याददाश्त के वापस लौटने का प्रश्न ही कहाँ उठता है, जो तथाकथित रूप से पुनर्जन्म बाद वापस उमड़ आए।
हमें पता है, लोग कहेंगे ‘आत्मा’ अमर है और एक मनुष्य के शरीर से मुक्त होने के बाद जब वह किसी दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तो अपने साथ वह पुरानी याददाश्त भी ले आती है। जबकि इसके लिए तो उस ‘सूक्ष्म आत्मा’ के पास वह मस्तिष्क नाम का पदार्थ भी होना चाहिए जो कि पूर्ण रूप से ‘स्थूल’ है। फिर, पुराणों में यह बताया गया है कि चौरासी लाख योनियों के बाद प्राणी को मनुष्य का जन्म मिलता है । इसका अर्थ यह है कि पूर्वजन्म की याद करने वालों को चौरासी योनियों के पूर्व की बातें याद आना चाहिए, लेकिन देखा ये जाता है कि इस तरह की आडंबरपूर्ण गतिविधियों में लोग बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व की ऊलजुलूल बातें सुनाकर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।
देखा जाए तो पुनर्जन्म से बड़ा झूठ दुनिया में कोई नहीं। इंसान या किसी भी जीवित प्राणी के जैविक रूप से मृत होने के बाद ऐसा कुछ शेष नहीं रह जाता जिसे आत्मा कहा जाता है। ब्रम्हांड में ऐसी किसी चीज़ का अस्तित्व नहीं है जिसका कोई रंग, रूप, गुण, लक्षण, ना हो। जिसकी कोई लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई, गहराई ना हो, जिसे नापा, तौला, ना जा सकता हो। जिसे जाँचा, परखा, देखा, सूँघा, चखा ना जा सकता हो। गीता के तथाकथित ज्ञान ‘आत्मा अमर है’ का विज्ञान के धरातल पर कोई औचित्य नहीं है ना ही उसके चोला बदलने की कहानी में कोई सत्यता है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि इन सब बातों का वैश्विक धरातल पर भी कोई पुष्टीकरण नहीं है। दुनिया की कई सभ्यताओं, संस्कृतियों, परम्पराओं में इन भ्रामक मान्यताओं का कोई स्थान नहीं है । यदि यह एक सार्वभौमिक सत्य है, तो इसका जिक्र दुनिया भर में समान रूप से होना चाहिए था, और विज्ञान।
आज के समय में जबकि मौजूदा जटिल सामाजिक परिस्थितियों में लोगों के अन्दर तर्कशक्ति का विकास करने की सख्त जरूरत है उन्हें पूर्वजन्म, पुनर्जन्म जैसी बकवास, अतार्किक बातों में उलझाकर उनकी चेतना के वैज्ञानिक विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश की जा रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती लोगों को ऐसे कुत्सित प्रयासों के खिलाफ समवेत आवाज़ उठाना चाहिए।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

भोपाल गैस त्रासदी-गैस पीड़ितों के साथ विश्वासघात

2-3 दिसम्बर 2009 को विश्व के भीषणतम औद्योगिक नरसंहार भोपाल गैस कांड की पच्चीसवी बरसी मनाई जा रही है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि पिछले पच्चीस सालों में गैस पीड़ितों की समस्याएँ जस की तस होने के कारण हर साल की तरह इस साल भी भोपाल के लाखों गैस पीड़ितों के ज़ख्म ही ताज़ा होंगे, फर्क सिर्फ यह होगा कि इस साल मौत के उस तांडव का रजत वर्ष होने के कारण देश विदेश के सैकड़ों लोग गैस पीड़ितों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने भोपाल आएँगे, उनमें से कुछ ऐसे भी होंगे जो उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के अलावा कुछ भी नहीं करेंगे।
जन-साधारण के साथ सरकारों के विश्वासघात के हज़ारों उदाहरण देश-दुनिया में देखने को मिलते रहते हैं परन्तु भोपाल गैस कांड को लेकर जिस तरह का विश्वासघात देश की केन्द्र सरकारों और मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों ने, (चाहे वे किसी भी पार्टी की रहीं हों) गैस पीड़ितों के साथ किया है, वैसा उदाहरण दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता।
भोपाल गैस त्रासदी तो फिर भी विश्व की अन्यतम औद्योगिक दुर्घटनाओं में शामिल है, जिससे हुए शारीरिक आर्थिक नुकसान का दूर बैठकर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। अमरीका अथवा पश्चिम के किसी भी देश में किसी छोटी-मोटी औद्योगिक दुर्घटना तक में लापरवाही बरतने एवं श्रमिकों, जनसाधारण के हताहत होने पर सज़ा एवं मुआवजे़ के जो कठोर प्रावधान हैं उनके आधार पर भोपाल गैस पीड़ितों के मामले में जिम्मेदार लोगों को सख़्त सज़ा के साथ-साथ कंपनी को जो आर्थिक मुआवज़ा भुगतना पड़ता उससे यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन को अपने आपको दिवालिया घोषित करना पड़ सकता। परन्तु गैस कांड के तुरंत बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हितों के नाम पर समस्त कानूनी कार्यवाही का अधिकार अपने हाथ में लेकर गैस पीड़ितों के हाथ तो काट ही दिए बल्कि गैस पीड़ितों की लड़ाई को इतने कमज़ोर तरीके से लड़ा कि ना इस नरंसहार के लिए यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन की जिम्मेदारी तय हो पाई और ना ही पश्चिमी कानूनों मुताबिक भोपाल गैस पीड़ितों को पर्याप्त मुआवज़ा ही मिल पाया। बड़े शर्म की बात है कि आज जब मामूली सी दुघर्टनाओं में हताहतों को इफरात मुआवज़ा मिल जाता है, भोपाल गैस पीड़ितों को इतना कम मुआवज़ा मिला है कि उसे भीख़ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। दिल्ली में हुए उपहार अग्निकांड तक में पीड़ितों को लाखों रूपए मुआवज़ा मिला है जबकि भोपाल के गैस प्रभावितों को जिनकी पीढ़ियाँ तक विषैली गैस से विकृति की शिकार पाई जाने का अंदेशा है, नाम मात्र का मुआवज़ा देकर, (जिसमें से काफी कुछ दलाल और सरकारी मशीनरी खा गई) मरने के लिए छोड़ दिया गया है।
दरअसल देखा जाए तो इस दुर्घटना के राजनैतिक सिग्नीफिकेन्स को दरकिनार रखकर गैस पीड़ितों की पूरी जद्दोजहद मुआवज़े के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित रही है जिसे लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकार के अलावा गैस पीड़ित संगठनों की भूमिका भी बेहद निराषाजनक रही है। मुआवज़े के नाम पर जो भी रकम सरकार के खाते में आई है उसके युक्तिसंगत प्रबंधन की जगह उसे फुटकर रूप से गैस पीड़ितों में बाँटकर अप्रत्यक्ष रूप से बाज़ार की मुनाफाखोर शक्तियों की जेब में पहुँचा दिया गया है। गैस पीड़ितों ने अपनी शारीरिक हालत की गंभीरता के प्रति अन्जान रहकर मुआवज़े के रूप में मिले उस पैसे को अपने इलाज पर खर्चने की जगह टी.वी. फ्रिज, मोटरसाइकिल और दीगर लक्ज़री आयटम्स की खरीदारी पर खर्च दिया। कुछ शारीरिक ताकत खोकर घर बैठने को मजबूर लोगों ने ज़रूर उस मुआवजे़ से कुछ दिन अपने जीवन की गाड़ी धकाई मगर अब उनके सामने अपने आप को मरते हुए देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। गैस पीड़ितों को पहुँचे गंभीर शारीरिक नुकसान के मद्देनज़र उसका बेहतर से बेहतर इलाज कराया जाना सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए था और इसके लिए मुआवजे़ की राशि को इस तरह न बाँटकर गैस पीड़ितों के लिए सर्व सुविधा युक्त आधुनिक अस्पतालों का जाल बिछाने के लिए इसका उपयोग किया जाना चाहिए था ताकि उन्हें वैज्ञानिक पद्धति से उपयुक्त एवं सस्ता इलाज मुहैया हो पाता और वे डॉक्टरों की लूटमार से भी बच जाते । मगर अफसोस सरकारों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा रोज़गार का है। अपनी शारीरिक क्षमता खो चुके गैस पीड़ितों के लिए उपयुक्त रोज़गार और इलाज के साथ-साथ सुचारू जीवन यापन के लिए ऐसे बड़े-बडे़ औद्योगिक संस्थानों की स्थापना किये जाने की आवश्यकता थी जहाँ शारीरिक क्षमता के अनुसार दीर्घकालीन रोज़गार उपलब्ध हो सके। इसी तरह पुनर्वास के मुद्दे पर कुछ बड़े सामुदायिक संस्थान खड़े किये जाने आवश्यक थे। इस तरह के कार्यक्रमों के ज़रिए गैस पीड़ितों के लिए मिले मुआवज़े का समुचित उपयोग संभव होता जिसका लाभ लम्बे समय तक गैस पीड़ितों को मिल सकता था। परन्तु भोपाल में इसके उलट गैस पीड़ितों को सीधे मुआवजे़ की राशि मुहैया कर कज्यूमर प्रोडक्ट कम्पनियों के वारे-न्यारे कर दिए गए। गैस पीड़ितों के पैसों को सरकारी स्तर पर सौंदर्यीकरण इत्यादि दीगर कामों पर भी बड़े पैमाने पर खर्च किया गया जिसका सीधा लाभ गैस पीड़ितों को नहीं मिल पाया। गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने भी अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद इस मामले में बिल्कुल भी दूरअंदेशी का परिचय नहीं दिया।
बहरहाल, एक भयानक पूँजीवादी साम्राज्यवादी षड़यंत्र के तहत भारत जैसे गरीब देश में मचाए गए मौत के इस तांडव के विरुद्ध एक सचेत राजनैतिक आन्दोलन के अभाव में गैस पीड़ितों का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई की जाना तो आज पच्चीस साल बाद संभव नहीं है लेकिन फिर भी मिथाइल आइसो साइनाइड और अन्य कई रसायनों के दूरगामी परिणामों के कारण गैस पीड़ितों के ऊपर भविष्य में आने वाले संकटों के मद्देनज़र तमाम गैस पीड़ितों एवं उनके लिए काम कर रहे संगठनों को एकजुट होकर एक प्रभावशाली आन्दोलन का निर्माण करना चाहिए, यही 2-3 दिसम्बर 1984 की रात मारे गए बेकसूरों को सम्मानजनक श्रद्धांजलि हो सकती है।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

विवाह एक नैतिक बलात्कार


जैसा कि अपेक्षित था वैसा ही हुआ। भोपाल की सड़कों पर ‘ऋषि’ अजय दास की पुस्तक ‘‘विवाह एक नैतिक बलात्कार’’ के, तथाकथित लव गुरू प्रोफेसर मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका शिष्या द्वारा विमोचन के होर्डिंग देखकर ही यह समझ लिया गया था कि भारतीय संस्कृति के रक्षकों के सक्रिय होने का वक्त आ गया है। वही हुआ। दिनांक 27.11.2009 को भोपाल के रवीन्द्र भवन परिसर में पुस्तक के लेखक ऋषि अजय दास को मुँह काला कर मारा-पीटा गया और विमोचन करने आए प्रो. मटुकनाथ एवं जूली को भी जूते मारने की कोशिश की गई। जिस प्रदेश में भारतीय संस्कृति के रक्षकों की सरकार हो वहाँ इससे कम की क्या उम्मीद की जा सकती है।
इसमें कोई शक नहीं कि वर्तमान समय में ‘विवाह’ नाम के एक नैतिक आवरण के पीछे काफी कुछ अनैतिक चल रहा है जिसे ठीक कर एक सुशिक्षित प्रजातांत्रित समतामूलक समाज के योग्य बनाए जाने का सामाजिक संघर्ष बेहद जरूरी है। मगर ‘‘विवाह एक नैतिक बलात्कार’’ जैसे शीर्षक से किताब लिखकर विवादित प्रो. मटुकनाथ-जूली से उसका विमोचन कराया जाना भी गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं है। यह प्रोपोगंडा के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों जैसा ही कुछ प्रतीत होता है।
हालाँकि पुस्तक के अन्दर क्या लिखा है यह पढ़ने का सौभाग्य अभी नहीं मिला है परंतु शीर्षक से स्पष्ट होता है कि लेखक विवाह के बाद पुरुष को मिल गए स्त्री पर बलात्कार के वैध लायसेंस के बहाने स्त्री पर अत्याचार के बारे में कुछ कहना चाहते है। इससे यह भी प्रतिध्वनित होता है कि ‘विवाह’ संस्था एक निकृष्ठ किस्म की व्यवस्था है । प्रो. मटुकनाथ एवं जूली की उपस्थिति से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने जो भी किया वह शुद्व रूप से नैतिक कारोबार है।
पुस्तक पढ़ने के पहले कुछ भी कहना हालाँकि जल्दबाज़ी होगी परन्तु कुछ बातों पर टिप्पणी की जाने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है विवाह के संबंध में । विवाह में आज भले ही कितना भी अनैतिक कारोबार आ घुसा हो परन्तु यह अब भी सामाजिक दृष्टि से एक उचित व्यवस्था है। बेमेल विवाह, लिव इन रिलेशन, समलैंगिक विवाह, अविवाहित रहकर आजीवन भ्रष्ट यौनाचारपूर्ण जीवन जीना यह सब एक अराजकतापूर्ण आसामाजिक नैतिक व्यवहार के उदाहरण हैं। विवाह में चाहे वह अरेंज विवाह हो या प्रेम विवाह, समान कर्म, समान विचार, समान आचार-व्यवहार, समान चिंतन सीमेंटिंग फेक्टर का कार्य करते हैं जिसको ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। इसके अभाव में पूरा जीवन एक दूसरे के साथ संघर्ष करते हुए एक अभिशाप की तरह गुजारना कोई समझदारी की बात नहीं है। बलात् रति क्रिया जिसे बलात्कार कहा जाता है, को सिरे से खारिज किये जाने की जरूरत है चाहे वह विवाह संस्था के अन्तर्गत हो या इसके बाहर गली-गली में, जैसा कि इन दिनों देखा जा रहा है।
प्रो. मटुकनाथ-जूली प्रकरण को इससे जोड़कर देखा जाना भी जरूरी है। प्रेम के नाम पर बाप-बेटी की उम्र के जोड़े को यौनाचार की इजाज़त नहीं दी जा सकती क्योंकि इसमें कोई सामाजिक हित स्पष्ट नहीं होता। ऐसे रिश्ते कहीं ना कहीं परिवार की अवधारणा को प्रभावित करते हैं। परिवार से उच्चतर संस्था का आविर्भाव मानव समाज में अभी हुआ नहीं है। बेमेल प्रेम में कोई सुंदरता प्रतीत नहीं होती है।
अंत में, उन तथाकथित संस्कृति रक्षकों की हरकत को एक प्रजातांत्रित समाज की दृष्टि से गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनर्गल, अवैज्ञानिक अनैतिक विचार-चिंतन जहाँ उचित नहीं है वहीं बात-बात पर लात-घूसे, जूते चलाकर संस्कृति की रक्षा का ढोंग करना भी नाजायज़ है। स्पष्ट तौर पर यह फासिस्ट तरीका है जिसके लिये एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं है। समाज में खुले आम चल रहे कई सारे अनैतिक कार्य-व्यापारों को देखकर भी ये संस्कृति के रक्षक चुप रहते हैं परन्तु जैसे ही कोई बौद्धिक गतिविधि उनके घिसे-पिटे, पुरातन, पतनशील वैचारिक संसार के आड़े आती हैं, जिसमें औरतों के लिए हिटलर की तरह ही - ‘‘घर के अन्दर जाओं अच्छी माँ बनो’’ जैसे विचार पालित-पोषित हैं, वे तुरंत अपने लात-घूसे और कालिख लेकर उपस्थित हो जाते हैं। इनकी इस फासिस्ट प्रवृत्ति के खिलाफ प्रगतिशील विचारों वाले जन-साधारण को भी सख्त कदम उठाने की ज़रूरत है।
इस तुरत प्रतिक्रिया में कई बिन्दुओं पर संक्षिप्त में चर्चा की मजबूरी थी, इसमें निहित अलग-अलग मुद्दों पर फिर चर्चा की जावेगी, तब तक यह दृष्टिकोण आपके हवाले।