मंगलवार, 23 मार्च 2010

शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-2)-जिसके लिए असंख्य कुरबानियाँ दी गई वह आज़ादी कैसी है.........

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यह बात आज सच साबित हो रही है । आज के हिन्दुस्तान की सामाजिक परिस्थिति देखने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 1 अरब से भी ज़्यादा आबादी में 95 प्रतिशत जनता बुरी तरह से 5 प्रतिशत शोषकों की शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। चाहे कोई पढ़ा लिखा हो चाहे अनपढ़ औद्योगिक मजदूर हो चाहे सड़क पर देहाड़ी करने वाला मज़दूर, चाहे वह कृषि मज़दूर हो या छोटा किसान, चाहे वह सरकारी कर्मचारी हो या गैरसरकारी, स्त्री हो, पुरुष हो, छात्र हो, नौजवान हो या बच्चा, यहाँ तक कि किसी माँ के पेट में पलता हुआ अपरिपक्व भ्रूण........ इस हिन्दुस्तान के अन्दर हर एक व्यक्ति बुरी तरह से पूँजीवादी शोषण का शिकार है। हर एक के एकदम बुनियादी अधिकारों के ऊपर शोषक वर्ग ने नाना तरीके से आक्रमण कर उसे वंचित कर रखा हुआ है। जहाँ दिन पर दिन गरीबी की रेखा के नीचे जनता का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, बेरोज़गारी का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, महँगाई बढ़ती ही जा रही है। सभी को शिक्षा की कोई व्यवस्था पहले ही नहीं थी, अब शिक्षा के निजीकरण के ज़रिए आम जनता के शिक्षा के अधिकार को संकुचित कर दिया जा रहा है। गरीबों के लिए चिकित्सा की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं, जहाँ विश्व भर में साइंस और टेक्नालॉजी उन्नत से उन्नत होती चली जा रही है, हिन्दुस्तान में मामूली सी बीमारी से आदमी मर जाता है। भीषण कुपोषण जिसके चलते जन्म दर कम होती चली जा रही है, मृत्युदर बढ़ती चली जा रही है।

लगातार लिए जा रहे कर्ज़ों का बोझ जनता के कंधों पर अनिवार्य जुए की तरह लदा हुआ है। बाहर से पैसा आता है विकास योजनाओं के लिए और तिजोरियाँ भरती चली जाती है हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग की। इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिन टाटा-बिड़ला की संपति आज़ादी के पहले मात्र कुछ करोड़ थी और अम्बानी जैसे पूँजीपति परिदृष्य में ही नहीं थे वहाँ आज कोई चार-पाँच सौ घराने देश की अकूत सम्पदा का उपभोग कर रहे हैं। जिस पूँजी को देश के औद्योगिक विकास में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के कृषि के आधुनिकीकरण में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के भीतर फिजूल नष्ट हो रही श्रम शक्ति के उपयोग और आम जनता के रोज़गार की व्यवस्था के लिए लगना चाहिए, वह मात्र कुछ घरानों की तिजोरी में कैद पड़ी हुई है, बल्कि भारतीय आम जनता का पर्याप्त शोषण करने के बाद अब वह देश की सीमाएँ लाँधकर दूसरे देशों की जनता के श्रम का शोषण करने भी पहुँच गई है। मतलब जो काम ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने यहाँ भारत में आकर किया, वही भारतीय पूँजीपति भी कर रहे हैं, यानी भारतीय पूँजीपति वर्ग भी साम्राज्यवाद का चरित्र अख्तियार कर चुका है..........।

सम्पूर्ण देश में नौकरशाही, हाथी के रूप में पाल छोड़ी गई है जो कि हिंसक एवं आदमखोर हो चुकी है। जाने कितने सारे आर्थिक घोटाले देश की जनता की कीमत पर खुले आम हो रहे हैं। लगातार नये नये टेक्सों को जबरदस्ती जनता के ऊपर लादकर दिन पर दिन उसकी कमर तोड़ी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सरकारें दिन पर दिन नए नए कानून अध्यादेश लागू कर देश की आम जनता की बुनियादी अधिकारों को भी छीने ले रही है, जिसमें से हर एक अधिकार मेहनतकश जनता ने काफी संघर्ष के बाद हासिल किया है।

देश भर में साम्प्रदायिक उन्माद की लहर व्याप्त है। जातीयता, प्रांतीयता, भाषा के झगड़े आदि आम बात हो गए हैं। साम्प्रदायिक संगठन हज़ारों की तादात में युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। और यह सब कुछ हो रहा है महज वोटों की राजनीति के चलते जिस राजनीति का काम है कि पूँजीपतियों के इस या उस खेमें के स्वार्थ की रक्षा करना, आम जनता के शोषण के लिए इस या उस घराने के लिए यथा सम्भव रास्ते खोलना।

निरन्तर भाग-३, दोपहर २ बजे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहन विचार से प्रस्तुत किया है आपने ये लेख ......शहीदों को भी दुःख होता होगा आज के मौजूदा हालत देख कर

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  2. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगत सिह को पोस्ट में याद करने लिए आभार बहुत बढ़िया प्रस्तुति .....

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  3. आपने शोषक वर्ग को 95 प्रतिशत दिखाकर बात बिगाड़ दी है जबकि हिमांशु कुमार जैसे गाँधीवादी भी मानते है कि शोषक वर्ग और शोषित वर्ग का अनुपात क्रमश: 20 : 80 का है. इस बीस-पच्चीस करोड़ की शोषक वर्ग की भारी आबादी में उद्योगपतियों के अलावा अमीर कुलक किसान, बुर्जुआ और वामपंथी पार्टियों के नेता, दुकानदार और व्यापारी, सरकारी और संगठित उद्योग के कर्मचारी और मजदूर तक शामिल है. मध्यम वर्ग की यह श्रेणी भी पूंजीवादी की बर्बरता की चक्की तले पिसने के कारण चिल्लपों मचाती रहती है. लेकिन इसका उस77 प्रतिशत आबादी से अलगाव और वैमनष्य भी जग-जाहिर है जिसे बीस रूपये दैनिक से कम पर गुजारा करते बताया जाता है. इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि इसी मध्यम जमात से सर्वहारा वर्ग की उन्नत कतारों के पैदा होने के भौतिक हालात सबसे अधिक समृद्ध होते हैं क्योंकि कुछ सहूलियतों के सदके ये अपना बौद्धिक विकास कर पाते हैं. मिडल श्रेणी के लोग पूंजीवाद की बर्बरता का शिकार होने के कारण कम परंतु अपने उच्च बौदिक स्तर के कारण अधिक, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को अपनाने के लिए बाध्य होते हैं. एक बोलेश्विक पार्टी के निर्माण में इस मिडल वर्ग से आने वाले लोगों को किस कतार में रखना है, इस प्रश्न का उत्तर वे ही लोग दे सकते हैं, जो इस प्रक्रिया का सक्रीय हिस्सा हैं. मेरा तो इतना ही कहना है कि इस वर्ग का चरित्र प्रतिक्रियावादी है जो सर्वहारा वर्ग से घृणा करता है.

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