सोमवार, 15 अगस्त 2011

जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

जिंदाबाद ! इन्क़लाब !
शलभ श्रीराम सिंह
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नफ़स नफ़स, कदम कदम
बस एक फ़िक्र दम-बदम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

जहाँ अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हो जान से
जहाँ पे लफ्ज-ए-अम्‍न एक खौफ़नाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो
वहाँ ना चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हाँ कहेंगे हम
हमारा हक़, हमारा हक़ हमें जनाब! चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए !
ज़बाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

यकीन आँख मूँदकर किया था जिन पे जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तानकर
उन्‍हीं की सरहदों में कै़द हैं हमारी बोलियाँ 
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियाँ।
जो इनका भेद खोल दे
हर एक बात बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्‍हीं की आह बे-असर उन्‍हीं की लाश बे-कफ़न
लहू पसीना बेच कर जो पेट तक न भर सकें
करें तो क्‍या करें भला, न जी सकें न मर सकें
सियाह ज़िन्‍दगी के नाम
जिनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमाँ को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिये!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !


होशियार ! कह रहा लहू के रंग का निशान !
ऐ किसान! होशियार! होशियार! नौजवान!
होशियार! दुश्‍मनों की दाल अब गले नहीं!
सफेदपोश रहज़नों की चाल अब चले नहीं!
जो इनका सर मरोड़ दे
गु़रूर इनका तोड़ दे
वो सरफरोश आरज़ू वही शबाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
ज़बाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए |
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्‍व़ाब क्‍या हुए
तुझे था जिनका इन्‍तज़ार वो जवाब क्‍या हुए
तू उनकी झूठी बात पर कभी न एतबार कर
कि तुझ को साँस साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए ,
जबाब दर सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए |
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !


 स्‍वर्गीय श्री शलभश्रीराम सिंह जनवादी परम्‍परा के महत्‍वपूर्ण कवि रहे हैं................

मंगलवार, 17 मई 2011

नकली कम्युनिस्ट जितनी जल्दी दफन हो जाएँ, भारतीय समाज के लिए अच्छा है।

    ओसामा के खात्में से जैसे आतंकवाद मर नहीं गया है उसी तरह पश्चिम बंगाल और केरल में वामपंथियों के चुनावी पतन से आम भारतीय समाज और मजदूर वर्ग के लिए ‘कम्युनिस्ट’ नामधारी नकली मार्क्सवादियों (जो सोशल डेमोक्रेट भी कहे जाते हैं) का खतरा टल नहीं गया है। सिर्फ इतना ही हुआ है कि ये सोशल डेमोक्रेट जो कई बार व्यवहार में सीधे-सीधे फासिस्ट भी साबित हो हुए हैं, सत्ता की ताकत के इस्तेमाल से पूँजीवादी स्वार्थों की पूर्ती नहीं कर पाएँगे, ना ही सत्ता के डंडे के माध्यम से अपने फासिस्ट चरित्र गुण-धर्मों का बर्बर प्रदर्शन भी नहीं कर पाएँगे।


    यूँ तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने जन्म से लेकर अब तक अनेक ऐसी त्रृटियाँ की हैं जिनके कारण उसके एक सही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी न होने बाबत् शक की कोई गुंजाइश ही कभी नहीं रही, परन्तु वैश्विक स्तर पर कम्युनिस्ट सत्ताओं के पतन के बाद से तो इसके चरित्र में और भी खतरनाक परिवर्तन आते देखे गए। इन्होंने खुलकर पूँजीवाद की सेवा में उतर कर भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को पूरी तरह बेच खाया। टाटा की नैनो कार के लिए वाम मोर्चा सरकार ने सिंगुर और नंदीग्राम में जिस तरह से आम जनता, किसानों पर गोली चलाई, जिस तरह से उनके कैडर ने पुलिस बलों के सहयोग से आन्दोलनरत ग्रामवासियों के घरों में धुस-धुसकर हत्याएँ और महिलाओं के साथ बलात्कार किये, वह सब घटनाएँ हरेक के ज़हन में अभी ताज़ा ही हैं। मल्टी नेशनल कम्पनियों का इस देश में सध रहा स्वार्थ किसी से छुपा नहीं है, परन्तु मजदूर आन्दोलन की समझ और अर्थव्यवस्था के ताने-बाने की वैज्ञानिक समझदारी की पृष्ठभूमि में किसी भी सर्वहारा की हितैषी पार्टी को जिस तरह से पेश आना चाहिए था, सी.पी.आई., सी.पी.एम. दोनों ही नकली कम्युनिस्ट पार्टियाँ उस तरह से कभी पेश नहीं आई।


    बाकी सब कुछ यदि छोड़ भी दिया जाए तो एक सर्वहारा की पार्टी से कम से कम क्या उम्मीद की जाना चाहिए, यही न कि वह अपने राज्य में अर्थ व्यवस्था को पूँजीपतियों का गुलाम न रहने दे, एक समाजवादी मॉडल पर उत्पादन एवं वितरण व्यवस्था के पुनर्गठन के लिए कदम उठाए जाएँ, प्रदेश में गरीबी-बेरोजगारी न रहे, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आम जनता मजदूर वर्ग की बदहाली दूर करने के लिए हो सके न कि पूँजीपतियों की तिजोरी भरने में। शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो जिससे वैज्ञानिक चिंतन पद्धति से लैस छात्रों-नौजवानों की एक पीढ़ी खड़ी हो और अपने प्रदेश को अवैज्ञानिक चिंतन से मुक्त करें और देश को भी राह दिखाए। महिलाओं की मुक्ति के प्रश्न पर हमें बहुत खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि पश्चिम बंगाल में खासकर कोलकाता और आसपास के इलाके में ‘वैश्यावृति’ जिस तरह से पनप और फल-फूल रही है उससे वामपंथियों की छद्म क्रांतिकारिता का अच्छी तरह से खुलासा होता है। ‘सोनागाछी’ जैसा वैश्यागमन का पारम्परिक अड्डा, जिसे वामपंथियों के सत्ता में आते ही बंद हो जाना चाहिए था और उन हालात की मारी औरतों और लड़कियों के लिए वैकल्पिक रोज़गार की व्यवस्था की जाना चाहिए थी, वह न होकर कोलकाता का यह धब्बा आज भी शान से चल रहा है। जन साधारण में कुसंस्कृति, नैतिक पतन, दुराचार, भ्रष्टाचार और तमाम पूँजीवादी प्रवृत्तियाँ इस कदर घर कर गईं हैं कि जिस बंगाल के बारे में कभी यह कहा जाता था कि - what Bengal thinks today, India thinks tomorrow (बंगाल आज जो सोचता है, कल पूरा भारत सोचता है), वह बंगाल इन नकली कम्युनिस्टों के कारण आज कई दशक पीछे चला गया है और देश को देने के लिए उसके पास पूँजीवादी संस्कृति के अलावा फिलहाल तो कुछ नहीं है। यही वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टियाँ अगर वास्तव में सही रास्ते पर चलकर अपनी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर रही होतीं तो सचमुच पूरे देश को इस पूँजीवादी संकट से मुक्ति का रास्ता दिखा पातीं, मगर वह तो खुद पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल के अलावा कहीं अपने पॉव पसार नहीं पाईं। यदि एक वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर संगठन के विकास की चेतना इन कम्युनिस्ट पार्टियों में होती तो इन चौतीस वर्षों में सत्ता के उपयोग से देश का कायापलट किया जा सकता था मगर इसके लिए जिस वर्ग दृष्टिकोण की आवश्यकता है उसका नितांत अभाव इन नकली कम्युनिस्टों में रहा है।
    अब रही बात ऋणमूल कांग्रेस की तथाकथित विजय की। यह तो स्पष्ट ही है कि चूँकि पश्चिम बंगाल में और कोई संसदीय पार्टी इतनी ताकतवर नहीं है जिसका राज्यभिषेक पूँजीपति वर्ग कर पाता, और चूँकि विगत कुछ वर्षों से ममता बैनर्जी जो क्रांग्रेस और दूसरी तरफ वामपंथियों की असफलताओं पर आग तापकर अपना उल्लू सीधा करने में सफल रही है, पूँजीपति वर्ग के लिए रेडीमेड एक मोहरे के रूप में उपलब्ध हो गई हैं, इसलिए इतनी आसानी से वे और उनकी पार्टी राज्य की सत्ता पर काबिज़ हो गई, जिसका अंदाज़ा पूरे देश ने पहले ही लगा रखा था। हालांकि विगत चौतीस सालों से जो कांग्रेस पश्चिम बंगाल में वनवास काट रही थी वह केन्द्र में सत्तारूढ होने के बावजूद वामपंथियों के खिलाफ चल रही हवा का फायदा नहीं उठा पाई, यह भी एक मार्के की बात है जिसके कई मतलब निकलते हैं।
    बहरहाल, इस परिवर्तन से सिर्फ इतना फर्क हुआ है कि हसिया-हथौड़ा की आड़ में छुपकर पूँजीवाद की सेवा करने वाली पार्टी के स्थान पर सीधे-सीधे पूँजीवादी पार्टी सत्ता में आ गई है, इससे राज्य की हालत में कोई परिवर्तन आएगा इसकी कोई संभावना नहीं है। वही ‘टाटा घराना’ फिर यदि राज्य के किसानों की ज़मीन हड़पने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करेगा तो ममता बैनर्जी उन्हें खुश करने के लिए किसानों पर गोली नहीं चलाएँगी ऐसा लगता नहीं है, क्योंकि राज्य का चरित्र तो वही है, सीट पर चाहे कोई और क्यों न आ जाए।
    एक और बात मार्क्सवाद को गालियाँ देने वालों के लिए। अगर कोई हवाई जहाज़ हवा में उड़ता हुआ गिर पड़ता है तो हम, गुरुत्वाकर्षण और गति के नियम खोजने वाले ‘न्यूटन’ को अथवा हवाई जहाज़ का अविष्कार करने वाले राइट बंधुओं को गाली नहीं देते, गाली देते हैं उस पायलेट को जो हवाई जहाज को ठीक से सम्हाल नहीं पाया। इसी प्रकार भारत में वामपंथियों द्वारा राजनीति की की गई दुर्दशा अथवा विश्व स्तर पर कम्युनिस्ट आंदोलन ध्वस्त होने के कारण हम मार्क्सवाद या उसके जनक और विकासकर्ताओं को गाली नहीं दे सकते। मार्क्सवाद मानवता का दुश्मन नहीं है, बल्कि वह तो एक ऐसा विज्ञान है जो मौजूद समस्त विज्ञानों के समन्वय से मानव समाज के विकास का रास्ता उपलब्ध कराता है। मगर यदि वह गलत हाथों में पड़ जाए जैसा कि वह हमारे देश में सी.पी.आई. सी.पी.एम. और दूसरे तमाम अति वामपंथी कम्युनिस्टों और नक्सली संगठनों के हाथ हुआ है, तो उसकी क्षमता का अन्दाज़ा लगा पाना असंभव है। परिवर्तन इस प्रकृति, मानव समाज एवं विश्वब्रम्हांड का अनिवार्य नियम है, इसे मानव समाज के हित की दिशा में ले जाने का रास्ता बताता है मार्क्सवाद, बस इसे ठीक से समझना और सचेत रूप से लागू करने का श्रम, मनुष्य को करना पड़ता है, तब परिवर्तन होता है, समाज बदलता है। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा सोशल डेमोक्रेटिक ताकतें नकली कम्युनिस्ट जितनी जल्दी दफन हो जाए, भारतीय समाज के लिए अच्छा है।     

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

अण्णा हज़ारे और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ; इस छोटी लड़ाई को एक बड़ी लड़ाई बनाना होगा

    देश की वर्तमान दुर्दशा के मद्देनज़र प्रख्यात गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हज़ारे की मुहीम को समर्थन न देने का प्रश्न नहीं उठना चाहिये मगर चूँकि उन्हें दूसरा गाँधी और उनकी मुहीम को दूसरा आजादी आंदोलन करार दिया जा रहा है इसलिए उन ऐतिहासिक त्रृटियों की पड़ताल करना ज़रूरी लग रहा है जिनके कारण गाँधीवादी चिन्तन देश को मौजूदा परिस्थितियों में पहुँचने से रोक नहीं सका। आज जब व्यापक जन समर्थन जुटता लग रहा है, उन्हीं त्रृटियों को दोबारा दोहराकर ज़्यादा कुछ हासिल करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
    जन आन्दोलनो का लम्बा अनुभव रखने वाले भूतपूर्व सैनिक अण्णा हज़ारे और फिलवक्त उनके साथ एकजुट हो गए कुछ भ्रष्टाचार विरोधी बुद्धिजीवी और एन.जी.ओ. राजनीति के लोग मूलतः, भ्रष्टाचार से संबंधित जन लोकपाल बिल के मुद्दे पर आन्दोलित हैं। इस बिल के मौजूदा स्वरूप में सत्ताधारियों ने भ्रष्टाचार की जवाबदेही से बचने के कई रास्ते बनाने की कोशिशें की है, ज़ाहिर है कि भ्रष्टों का इरादा क्या है, लेकिन यदि इस बिल को, हूबहू जैसा कि आन्दोलनकारी चाहते है, वैसा ही स्वीकार कर कानून का रूप  दे दिये जाने के बावजूद भी इस देश में भ्रष्टाचार के ज़रिये पब्लिक प्रापर्टी की लूट का माहौल खत्म हो जाएगा या उस पर थोड़ा बहुत अंकुश लगेगा यह सोचना मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है।
    दरअसल ‘व्यवस्था’ का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण न हो पाने की जिस भयानक गलती के कारण भारतीय आम जनता स्वतंत्रता का वास्तविक फल आज तक नहीं भोग सकी है, वह गलती जब तक दोहराई जाती रहेगी, आम जनसाधारण एवं भारतीय समाज की और दुर्दशा होती चली जाएगी। अण्णा के आंदोलन को भले ही जबरदस्त समर्थन मिला हो लेकिन भ्रष्टाचार के मूल को नष्ट करने की वहाँ न तो चर्चा हो रही है न व्यवस्था के आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही है इसलिये भले ही शरद पवार जैसे कुछ लोगों को पद छोड़ना पड़े मगर सच यह है कि सारी परेशानी की जड़ यह पूँजीवादी व्यवस्था है शरद पवार जिसका एक पुर्जा मात्र है।
    मौजूद समाज में चाहे कितना भी ईमानदार व्यक्ति हो, जब तक वह इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करता कि हमारा समाज एक वर्ग विभाजित समाज है और वर्तमान में मौजूद सभी तथाकथित प्रजातांत्रिक संस्थाएँ चाहे वह पार्लियामेंट हो, अदालतें हों, कानून-व्यवस्था को चलाने वाले संस्थान हो, सब कुछ पूँजीवादी शोषक वर्ग द्वारा अपने स्वार्थ को साधने के लिए बनाई और चलाई जा रही संस्थाएँ हैं, जो कि राजतंत्र के विरुद्ध लड़ाई के समय कभी प्रगतिशील रही होंगी, लेकिन अब पूँजीवाद की आवश्यकताओं के कारण घोर प्रतिक्रियाशील एवं जनविरोधी हो चुकी है। जो ‘यंत्र’ पूँजीवाद ने अपने मुनाफावादी स्वार्थ को अक्षुण्ण रखने के लिए बनाया हो उसे जनसाधारण के व्यापक हित में साधा ही नहीं जा सकता चाहे कितना भी आन्दोलन किया जाए। इस समय सम्पूर्ण तथाकथित भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था, पूँजीवादी हितों की रक्षा में लगी हुई है इससे हो रहे प्रजातांत्रिक मूल्यों के हनन की किसी को चिन्ता नहीं है, अतः चन्द गैर सरकारी संगठनों को एकत्र कर किये जा रहे ऐसे छोटे-मोटे फौरी आन्दोलनों का कोई अर्थ नहीं है जो स्वार्थी मीडिया के संदिग्ध समर्थन के कारण इतना लोकप्रिय प्रतीत हो रहा है।
    गाँधीजी ने अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को आधार बनाकर जो स्वतंत्रता आंदोलन डिज़ाइन किया था उससे आज़ादी तो मिल गई मगर जिस ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्थार्थ को साधने के लिए तत्कालीन पार्लियामेंट ने आजादी के पूर्व अपनी जनविरोधी बर्बर भूमिका निभाई थी, उसी पार्लियामेंट्री मॉडल को हूबहू अपना लिए जाने के कारण शुरुआत से ही भारतीय जन साधारण के हितों पर कुठाराघात होना तय था। आज भी अण्णा हज़ारे जैसे लोग उसी पार्लियामेंट और पार्लियामेंट्री सिस्टम की ओर आशा की निगाह से देख रहे हैं जो पूँजीवाद के स्वार्थों के पति समर्थित हैं।
    देश में चलाई जा रही पूँजीवादी व्यवस्था के वर्गीय स्वार्थ के कारण आज देश में अमीरों और गरीबों के दो पृथक भारत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहे है जिनके आपसी हित एक दूसरे का साथ कतई मेल नहीं खाते। आज़ादी आंदोलन के समय इस खतरे को भाप लिया जाना चाहिए था लेकिन गाँधी-नेहरू के पूँजीवादी दृष्टिकोण के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के समय इस खतरे की चेतावनी दे रही भगतसिंह और सुभाष बोस की क्रांतिकारी धारा को, उनके आमूल-चूल परिवर्तन के क्रांतिकारी सिंद्धांत को भी गाँधी और तमाम गाँधीवादियों द्वारा अछूत मानकर तिरस्कृत किया गया, ज़ाहिर है उसके पीछे भी वर्ग स्वार्थ को साधने में महसूस की गई अड़चन एवं कुंठा मुख्य भूमिका निभा रही थी।
    इस सच्चाई की समझ के साथ पूँजीवाद के विरुद्ध एक ताकतवर जन आन्दोलन के अभाव में पूँजीवाद उत्तरोत्तर विकसित होता चला गया बल्कि साथ ही साथ भयानक तरीके से जनविरोधी होता चला गया, और धीरे-धीरे साम्राज्यवादी स्वार्थों की ओर बढ़ते जाने के कारण देश में सभी प्रकार की अन्तराष्ट्रीय गंदगी का जमावड़ा होता चला गया और उसके उपादान के रूप में राष्ट्रव्यापी यह भ्रष्टाचार आज अपना फन फैला चुका है जिससे पूरा देश हलाकान है। आम जनता की बात करने वाले अण्णा हज़ारे एवं उनके साथियों द्वारा कभी पूँजीवादी सत्ता के विरुद्ध एक व्यापक जन आन्दोलन का आव्हान नहीं किया। अस्सी-नब्बे के दशक में जिस तरह से डंकल प्रस्तावों की स्वीकृति के साथ भूमंडलीकरण का रास्ता खुला देश में पैसे की रेलमपेल और अनैतिकता बढ़ती चली गई। प्रायवेटाइजेशन के माध्यम से सरकारी सेक्टर को नष्ट कर भ्रष्टाचार के माध्यम से अंधाधुंध कमाई के रास्ते खोल गए और नतीजे के तौर पर पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जो सडांध व्याप्त हो गई है उसमें जन साधारण का जीना दूभर होता चला गया है। ऐसे में जब अन्तराष्ट्रीय दबावों में देश को अव्यवस्था के मुहाने पर ले जाया जा रहा था अण्णा हज़ारे और उनके समर्थकों की चुप्पी आश्चर्यजनक रही है।
    इस देश में कानूनों की कोई कमी नहीं है परन्तु न तो उनके पालन करने की संस्कृति का विकास हो पाया और न ही सरकारी स्तर पर  उनको पालन करवाने की प्रभावशाली इच्छा शक्ति कभी देखी गई, ऐसे में कानूनों में मामूली सुधारों के माध्यम से किसी बड़े परिवर्तन की आशा करना बेमानी है। जन लोकपाल बिल के आन्दोलनकारियों की इच्छा के अनुरुप आ जाने से भी कुछ होने वाला नहीं है, उसका भी हश्र वैसा ही होना है जैसा कि सूचना के अधिकार और अन्य दूसरे कानूनों का हुआ है।
    इसलिए ज़रूरत है एक ऐसे दीर्घकालीन आन्दोलन की जो इस देश में हुई तमाम ऐतिहासिक त्रृटियों से सबक लेते हुए एक विराट सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण की शक्ल लेकर आमूल-चूल परिवर्तन के लिए रास्ते खोल सके और वर्तमान में संगठित हो रहा जन आक्रोश किसी भी कीमत पर कुंठित होकर न रह जाए।
    एक और महत्वपूर्ण बात, अण्णा हज़ारे और तमाम भ्रष्टाचार विरोधी व्यक्ति एवं व्यक्ति समूह यदि पूँजीवादी व्यवस्था के हाथों किसी खेल का खिलौना बनकर इस्तेमाल न किये जा रहे हों तो उन्हें इस छोटी लड़ाई को एक बड़ी लड़ाई बनाने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

रविवार, 6 मार्च 2011

भोपाल या भोजपाल............प्रजातंत्र का इससे ज्यादा अपमान और क्या हो सकता है!

    मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 28 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने आम जनता की गाढ़ी कमाई का धन फूँकते हुए बड़ी धूमधाम से राजभोज की प्रतिमा की स्थापना की और जश्न मनाया। इस मूर्ति की स्थापना के साथ ही भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार ने अपनी सामंती प्रतिबद्धताओं का इज़हार करते हुए एक तरह से आम जनसाधारण की खिल्ली उड़ाने का प्रयास किया है, जिसने अभी कुछ ही वर्षों पहले मानव समाज के इतिहास को एक क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा देते हुए राजा-महाराजाओं की सामंती सत्ता को उखाड़ फेंककर प्रजातांत्रिक समाज व्यवस्था का आगाज़ किया था।
    कितने आश्चर्य की बात है कि आमजनसाधारण के शोषित-उत्पीड़ित समाज की आशाओं-आकांक्षाओं पर पूरी तरह से असफल इस तथाकथित प्रजातंत्र के कठिन दौर में, प्रजातांत्रिक तकाज़ों को पूरा करने की चिंता करने की बजाय आजकल की इन तथाकथित चुनी हुई प्रजातांत्रिक सरकारों को इतिहास में दफन हो चुकी एक सामाजिक व्यवस्था के स्वयंभू भगवान राजाओं-महाराजाओं को फिर से महिमामंडित करने की आवश्यकता पड़ रही है। क्यों ? पता नहीं।
    जहाँ तक ‘राजभोज’ का प्रश्न है, वह दुष्ट, आततायी, अत्याचारी किस्म का राजा था अथवा नहीं इस बहस में न पड़कर एक सामान्य ऐतिहासिक  सत्य की चर्चा की जाए तो इतिहास हमें बताता है कि सामंती युग में राजसत्ता का इतिहास शोषण, अत्याचार, दमन के माध्यम से जबरदस्ती अपनी सत्ता कायम रखने का इतिहास रहा है, इसका अपवाद शायद ही कोई राजा और राज घराना रहा हो। राजा-महाराजाओं, सामंतों के राज में आम जनसाधारण का सामाजिक जीवन में कभी कोई महत्व नहीं रहा और न उनके पास कभी कोई बुनियादी अधिकार ही रहे जिन्हें आज जनतांत्रिक अधिकारों के नाम से जाना जाता है। इन जनतांत्रिक अधिकारों को हासिल करने के लिए उस समय आमजनसाधारण को राज घरानों से बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा था, खून तक बहाना पड़ा। प्रजा को राजा के चरणों में झुकाए रखने के लिए धर्म ने भी अपनी कुटिल भूमिका खूब निभाई, राजाओं को भगवान का दर्जा देकर प्रजा की प्रतिबद्धताएँ राज्य की ओर बनाए रखने में धर्म का योगदान हर कोई जानता है। मगर इस व्यवस्था को इतिहास के क्रम में लुप्त हो जाना पड़ा। राजभोज का महिमामंडन उसी व्यवस्था के महिमामंडन से कुछ कम नहीं प्रतीत होता।
    राज भोज ने भले ही मंन्दिर-तालाब और दूसरी कुछ संरचनाएँ बनवाई हों, मगर सामंती समाज के तकाज़ों के कारण ही अपने अथक शारीरिक श्रम से उन्हें बनाने वाले आम जनसाधारण का इतिहास में कभी कोई नाम नहीं हुआ। ताजमहल को हज़ारों हुनरमंद कारीगरों ने अपने कठिन श्रम से तैयार किया था मगर इतिहास में उस शहंशाह का नाम ही दर्ज है, वास्तुकला के उस विश्वस्तरीय नमूने को आकार देकर अपने हाथ कटवाने वाले उन कारिगरों का नहीं। अफसोस तो तब होता है जब इतिहास को अच्छी तरह से जानने-समझने के बावजूद प्रजातंत्र का ढोल पीटने वाले तमाम राजनेताओं को सामंती समाज की दबी-कुचली प्रजा के कठिन परिश्रम और संघर्षों का नहीं बल्कि राजाओं की तथाकथित का महानता का ज़्यादा खयाल रहता है। प्रजातंत्र का इससे ज्यादा अपमान और क्या हो सकता है।
    भोपाल का राजा भोज से कभी कोई करीबी ताल्लुक नहीं रहा दुनिया जानती है। यदि किसी रूप  में राजा भोज ‘भोपाल’ या तथाकथित ‘भोजपाल’ के नियंताओं निर्माताओं में रहे होते तो भोपाल का पुरातात्विक इतिहास इस बात की गवाही अवश्य देता। एक तालाब को छोड़कर (वह भी राजा भोज का बनाया हुआ है या नहीं संशय की बात है) भोपाल में कोई भी पुरातात्विक महत्व का भवन ऐसा नहीं है जिससे राजा भोज की यहाँ स्थाई उपस्थिति की बात साबित होती हो। हाँ, राजे-महाराजे अपने राजहितों में एक राज्य से दूसरे राज्य में घूमते-फिरते रहते थे, इस दौरान वे अपने फौज-फाटे के उपयोग के लिए कभी-कभी कोई स्थाई-अस्थाई संरचना बनवाया करते थे, मगर भोपाल में नवाबों के शासन के दौरान का वास्तुशिल्प ही प्रमुख रूप से दिखाई पड़ता है और यही भोपाल की पहचान है। किसी अच्छे खासे शहर की दुनिया के ज़हन में बसी पहचान को धो-पोछकर उसका एक ऐसा नामांतरण कर दिया जाना कोई समझदारी नहीं हो सकती, जिसके पीछे कोई विशेष ऐतिहासिक तथ्य मौजूद ही न हों। भोपाल को भोजपाल नाम देने की कवायद न केवल गैरज़रूरी है बल्कि एकदम फिजूल भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मध्यप्रदेश सरकार के पास करने को और कोई दूसरा काम अब बचा नहीं है।
    राजा भोज जहाँ के थे वहाँ मजबूती से स्थापित हैं, उन्हें वहाँ से कोई नहीं हटा सकता, मगर नवाबी दौर की पहचान वाले ‘भोपाल’ को ‘भोजपाल’ बना देने का प्रयास कर बेकार का एक विवाद खड़ा करने में कौनसी दूरअन्देशी और राजनैतिक समझदारी है यह अस्पष्ट है। ऐसे विवादों को खड़ा करने में संधियों और भाजपाइयों को हमेशा से रुचि रही है। संधी-भाजपाई अपनी इस कुत्सित चाल में कामयाब न हों इसके लिए न केवल भोपालियों का बल्कि प्रजातांत्रिक सराकारों वाले उन तमाम लोगों को सामने आकर भाजपा के इस षड़यंत्र को नाकाम करना चाहिए।

बुधवार, 2 मार्च 2011

क्या लिंग पूजन भारतीय संस्कृति है ?

           आज 'शिवरात्री' है। एक ऐसे भगवान की पूजा आराधना का दिन जिसे आदि शक्ति माना जाता है, जिसकी तीन आँखें हैं और जब वह मध्य कपाल में स्थित अपनी तीसरी आँख खोलता है तो दुनिया में प्रलय आ जाता है। इस भगवान का रूप बड़ा विचित्र है। शरीर पर मसान की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटा में गंगा नदी तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को उन्होंने अपना वाहन बना रखा है।
          भारत में तैतीस करोड़ देवी देवता हैं, मगर यह देव अनोखा है। सभी देवताओं का मस्तक पूजा जाता है, चरण पूजे जाते हैं, परन्तु इस देवता का 'लिंग' पूजा जाता है। बच्चेबूढ़ेनौजवान, स्त्रीपुरुष, सभी बिना किसी शर्म लिहाज़ के , योनी एवं लिंग की एक अत्यंत गुप्त गतिविधि को याद दिलाते इस मूर्तिशिल्प को पूरी श्रद्धा से पूजते हैं और उपवास भी रखते हैं।
          यह भगवान जिसकी बारात में भूतप्रेतपिशाचों जैसी काल्पनिक शक्तियाँ शामिल होती हैं, एक ऐसा शक्तिशाली देवता जो अपनी अर्धांगिनी के साथ एक हज़ार वर्षों तक संभोग करता है और जिसके वीर्य स्खलन से हिमालय पर्वत का निर्माण हो जाता है। एक ऐसा भगवान जो चढ़ावे में भाँगधतूरा पसंद करता है और विष पीकर नीलकण्ठ कहलाता है। ओफ्फोऔर भी न जाने क्याक्या विचित्र बातें इस भगवान के बारे में प्रचलित हैं जिन्हें सुनजानकर भी हमारे देश के लोग पूरी श्रद्धा से इस तथाकथित शक्ति की उपासना में लगे रहते है।
          हमारी पुरा कथाओं में इस तरह के बहुत से अदृभुत चरित्र और उनसे संबधित अदृभुत कहानियाँ है जिन्हें पढ़कर हमारे पुरखों की कल्पना शक्ति पर आश्चर्य होता है। सारी दुनिया ही में एक समय विशेष में ऐसी फेंटेसियाँ लिखी गईं जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों से परे कल्पनातीत पात्रों, घटनाओं के साथ रोचक कथाओं का तानाबाना बुना गया है। सभी देशों में लोग सामंती युग की इन कथाओं को सुनसुनकर ही बड़े हुए हैं जो वैज्ञानिक चिंतन के अभाव में बेसिर पैर की मगर रोचक हैं। परन्तु, कथाकहानियों के पात्रों को जिस तरह से हमारे देश में देवत्व प्रदान किया गया है, अतीत के कल्पना संसार को ईश्वर की माया के रूप में अपना अंधविश्वास बनाया गया है, वैसा दुनिया के दूसरे किसी देश में नहीं देखा जाता। अंधविश्वास किसी न किसी रूप में हर देश में मौजूद है मगर भारत में जिस तरह से विज्ञान को ताक पर रखकर अंधविश्वासों को पारायण, जपतप, व्रतत्योहारों के रूप में किया जाता है यह बेहद दयनीय और क्षोभनीय है।
          देश की आज़ादी के समय गाँधी के तथाकथित 'सत्य' का ध्यान इस तरफ बिल्कुल नहीं गया। नेहरू से लेकर देश की प्रत्येक सरकार ने विज्ञान के प्रचार-प्रसार, शिक्षा और भारतीय जनमानस के बौद्धिक विकास में किस भयानक स्तर की लापरवाही बरती है, वह इन सब कर्मकांडों में जनमानस की, दिमाग ताक पर रखकर की जा रही गंभीरतापूर्ण भागीदारी से पता चलता है। आम जनसाधारण ही नहीं पढ़े लिखे शिक्षित दीक्षित लोग भी जिस तरह से आँख मूँदकर 'शिवलिंग' को भगवान मानकर उसकी आराधना में लीन दिखाई देते हैं, वह सब देखकर इस देश की हालत पर बहुत तरस आता है।
          यह भारतीय संस्कृति है! अंधविश्वासों का पारायण भारतीय संस्कृति है ! वे तथाकथित शक्तियाँ, जिन्होंने तथाकथित रूप से विश्व रचा, जो वस्तुगत रूप से अस्तित्व में ही नहीं हैं, उनकी पूजा-उपासना भारतीय संस्कृति है! जो लिंग 'मूत्रोत्तसर्जन' अथवा 'कामवासना' एवं 'संतानोत्पत्ति' के अलावा किसी काम का नही, उसकी आराधना, पूजन, नमन भारतीय संस्कृति है?
          चिंता का विषय है !! कब भारतीय जनमानस सही वैज्ञानिक चिंतन दृष्टि सम्पन्न होगा !! कब वह सृष्टी में अपने अस्तित्व के सही कारण जान पाएगा!! कब वह इस सृष्टि से काल्पनिक शक्तियों को पदच्यूत कर अपनी वास्तविक शक्ति से संवार पाएगा ?

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

वाह क्या क्रांति है और क्या क्रांतिकारी हैं।


कल अबूझमाड़ में बड़ा गज़बनाक सीन पेश हुआ...... महान क्रांतिकारी संत स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में  नक्सलियों की एक जनअदालत में नारे लगाए जा रहे थे सी.पी.आई.(एम.एल.) जिन्दाबाद, सी.ए.एफ (छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल ) जिन्दाबाद। नक्सलियों ने जवानों की रिहाई अबुझमाड़ के करियामेटा जंगल में दो हजार लोगों की मौजूदगी में बुलाई इस जनअदालत के बाद की थी । समझा जा सकता है कि यह नारेबाजी सी.पी.आई.(एम.एल.) के उत्साही कार्यकर्तागण कर रहे थे जिन्हें नक्सली कहा जाता है। वाह क्या क्रांति है और क्या क्रांतिकारी हैं।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

प्रसंग विनायक सेन-व्यवस्था उन्हें भी धीरे धीरे कुचल देगी

           दुनिया के सबसे बडे़ प्रजातंत्र की एक अदालत ने जनसंघर्षों के एक प्रबल समर्थक को ‘‘उम्रकैद’’ की सजा सुनाई है, स्पष्ट है कि यह जर्जर व्यवस्था बिल्कुल नहीं चाहती कि ‘‘डॉ. विनायक सेन’’ जैसे लोग किसी भी सूरत में शोषित-पीड़ित आम जनता को संगठित करने, उनके साथ चल रहे पूँजीवादी षड़यंत्रों का पर्दाफाश करने, और मुट्ठी भर शोषकों के द्वारा चलाए जा रहे जबरदस्ती के शासन के विरुद्ध सच्चे जनतंत्र की चेतना का अलख जगाए।
          डॉ. विनायक सेन को सुनाई गई उम्र कैद की सजा पर बुद्धिजीवियों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है, जिसका लब्बो-लुबाब महज़ यह है कि जब देश में बड़े-बड़े अपराधी, घोटालेबाज, भ्रष्ट लोग, चोर-लुटेरे-डाकू, साम्प्रदायिक शुचिता को नष्ट करने वाले अपराधी, बलात्कारी और तमाम जनद्रोही खुले आम आज़ाद घूम रहे हैं तो फिर विनायक सेन को क्यों उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है! सवाल सुनने में बड़ा आकर्षक और विचारोत्तेजक लगता है लेकिन इसका सिर्फ एक ही जवाब हो सकता है वह यह कि-तुम जैसे, व्यवस्था से छोटे-छोटे लाभ पाने के लालच में उससे चिपके हुए खामोशी से यह तमाशा देखते रहने वाले शिखंडी बुद्धिजीवियों के कारण यह सब हो रहा है। सत्य को दफनाने के लिए इन अवसरवादी बुद्धिजीवियों द्वारा जिस तरह से मूक रहकर व्यवस्था का साथ दिया जाता है उससे तो यही कहा जा सकता है कि यही इस युग के सबसे बड़े अपराधी है जो कुव्यवस्था के खिलाफ खुलकर सामने आने से कतराते हैं ताकि उनके घटिया स्वार्थों की पूति बंद ना हो जाए।
          देश में जो कुछ चल रहा है वह हिटलर के समय की याद ताज़ा करता है जब चुन-चुनकर कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को काल कोठरियों में पहुँचा दिया जाता था। यदि हम हिटलर के नेतृत्व में चले सर्वहारा मजदूर वर्ग विरोधी व्यापक फासीवादी दुष्चक्र को सिर्फ इसलिए याद न करना चाहें कि उसके साथ कम्युनिस्ट आन्दोलन की यादें जुड़ी हैं, और विनायक सेन भी वैचारिक रूप से साम्यवादी आदोलन के ही समर्थक हैं, तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन घटनाओं को याद करके भी हम इस समय की गंभीरता को सुविधाजनक रूप से समझ सकते हैं जब तथाकथित ब्रिटिश कानून सीधे तौर पर अँग्रेज शोषक-शासक वर्ग का पक्षधर कानून था। ब्रिटिश शासनकाल में भी दमन और उत्पीड़न का वह दौर गुजरा है जब ब्रिटिश राजसत्ता ने अपने विरोधियों को जेल की सलाखों के पीछे कैद किया था, फॉसी की सज़ा सुनाई थी। वह भी ऐसा ही समय था जब मुट्ठी भर सत्ताधारियों ने जनता की आवाज़ को दबाने के लिए प्राणघातक दमनचक्र चलाया था, जबकि उस समय तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातंत्रकी अवधारणा आज की बनिस्पत ज्यादा नई और प्रगतिशील थी।
          आँख खोलकर देखने की ज़रूरत है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र अब मूल में लोकतंत्र विहीन होकर रह गया है जिसकी कानून व्यवस्था, पूँजीवादी शोषक-शासक राजसत्ता की ही पक्षधर है। शोषक और शोषित के मध्य एकता के फर्जी सिद्धांत लोकतंत्र के सारे मुखौटे अब उतर चुके हैं और अब यह शुद्ध रूप से पूँजीवादी व्यवस्था की चाकरी पर उतर आया है, इसलिए इसके लिए अब यह अनिवार्यता सी हो गई है कि डा.विनायक सेनजैसे, जनता की समझ विकसित कर, मुट्ठी भर शोषकों के विरुद्ध उन्हें लामबंद करने वाले लोगों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए।
          डा. विनायक सेन को दी गई सज़ा देश भर में फैले उन जैसे हज़ारों सर्वहारा जन समर्थकों के लिए भी एक चेतावनी है कि अब भी अगर उन्होंने अपना अभियान बंद न किया, व्यवस्था के आड़े आए तो उनका भी यही हश्र होगा। साथ ही साथ जनता के दुख दर्द को समझने वाले उन हज़ारों लोगों के लिए भी यह घटना एक सबक है कि यदि अब भी वे इस प्रतिक्रियावादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई में ऐसे ही छितरे-छितरे रहे, एकजुट न हुए तो यह व्यवस्था उन्हें भी धीरे धीरे कुचल देगी।   

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

राजधानी भोपाल में किसानों का हल्ला बोल.......



          राजधानी भोपाल में प्रदेश भर के किसानों ने ऐन मुख्यमंत्री बंगले के नीचे जबरदस्त धरना देकर अपनी ताकत दिखा दी है। कल दिन भर भोपाल में आम जनता की आवाजाही एवं तमाम प्रशासनिक गतिविधियाँ बुरी तरह से प्रभावित हुई। आज के अखबारों में किसानों एवं उनके नेताओं के बयान छपे है कि जब उनकी परेशानियाँ किसी को नहीं दिखती तो वे भी किसी की परेशानियाँ क्यों देखें। किसान अपने साथ खाने-पीने का सामान और सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ कर के आएँ है जिससे लगता है कुछ दिन और राजधानी को उनकी कैद में रहना पडे़गा। 
          धरना भारतीय किसान संघ का है जो कि भारतीय जनता पार्टी का ही भाई-बंद है और राष्ट्रीय सेवक संघ का जाया संगठन है इसलिए इस आयोजन को शक की निगाह से देखा जाना जरूरी है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जो कि आमतौर पर धरना-प्रदर्शनों पर लाठी चार्ज करने में आगे-पीछे नहीं देखते, और अभी कुछ ही दिनों पहले मास्टरों की अच्छी खासी मरम्मत करके उन्हें राजधानी से भगाया गया था, ऐसे में कई महीनों से चल रही किसानों की तैयारी और उनके आक्रामक मूढ़ को न भांप पाकर आज शिवराज प्रशासन पंगु होकर रह गया है यह मानना सरासर नादानी होगी। हमें लगता है कि यह धरना भारतीय जनता पार्टी के उस गुट का प्रायोजित धरना हो सकता है जो शिवराज की राहों में कांटे बिछाने की कई कोशिशें कर चुके हैं और अभी भी करते आ रहे हैं, या फिर जिस तरह से पुलिस-प्रशासन आन्दोलनकारियों के साथ दोस्ताना रवैया अपनाए हुए है उससे लगता है कि इसमें शिवराज सिंह चौहान की ही कोई चाल हो सकती है। यदि शिवराज की चाल है तो खुद उनके विरोधी एक दो दिन में इसका खुलासा कर देंगे, ऐसी उम्मीद है।
          बहरहाल, जो भी हो किसान चाहे भारतीय किसान संघ का किसान हो या किसी और संगठन से जुड़ा किसान, उसकी समस्याओं को पूँजीवादी घरानों की दादागिरी के इस दौर में जिस तरह से नज़रअन्दाज़ किया जा रहा था, उसका प्रतिफल तो मौजूदा पूँजीवाद परस्त सरकारों को मिलना ही चाहिए था। देशभर में जिस तरह किसानों के साथ भेदभाव, षड़यंत्र चल रहे है उसके खिलाफ किसान को एक जुट होना बेहद जरूरी था वर्ना कृषि और किसानों का सर्वनाश सुनिश्चित था। इस धरने में शामिल किसान राजनैतिक रूप से कितने सचेत हैं और अपने ऊपर हो रहे पूँजीवादी हमलों से कितना वाकीफ हैं कहना मुश्किल है, मगर तमाम तथाकथित प्रजातांत्रिक सरकारें जनता की असली ताकत को भूलकर, उन्हें महज वोट समझकर जिस तरह राजकाज चलाती आ रहीं हैं, उन्हें किसानों के इस आक्रामक मूढ़ से डरकर उनके हित में राजकाज चलाना सीखना होगा वर्ना यह तय है कि आने वाले समय में देश की केन्द्र सरकार और तमाम राज्य सरकारें किसानों और आम जनता के इस आक्रोश से बच नहीं पाएँगी। जनता एक ना एक दिन सच्चाई समझ जाती है और संगठित होकर तख्ते पलटती है आज के पूंजीपरस्त राजनेता इस बात को अगर भूल गए हों तो फिर से याद करलें।
          भोपाल में किसानों का यह हल्ला बोल आन्दोलन राजनैतिक प्रतिबद्धताओं से परे पूरे देश के किसानों में फैल सकता है और एक राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन में तब्दील हो सकता है इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 
पुनश्च- आज राजधानी भोपाल के सारे अखबार किसानों के इस धरने से जनता को हो रही परेशानी की खबरों से भरे पड़े हैं, वे यदि आम जनता को किसानों की परेशानी विस्तार से बताते तो ज़्यादा अच्छा रहता। आखिर किसान राजधानियों की तमाम सुविधाभोगी आम जनता के लिए अन्न उपजाता, है इस बात को नहीं भूलना चाहिए।         

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

गैस त्रासदी 26वी वर्षगांठ - जन आन्दोलन कमज़ोर हो तो ये सभी संस्थाएँ ऐसे विश्वासघात करतीं ही हैं......

    आज विश्व की भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना की छब्बीसवी वर्षगांठ है, जिसे विश्व के सबसे बडे़ औद्योगिक षड़यंत्र के रूप में याद किया जाना चाहिए। भोपाल में गैस पीड़ित बस्तियों में कुछ बद्धिजीवी लोग, कुछ सरकारी-गैर सरकारी गैस पीड़ित संगठन कुछ राजनैतिक पार्टियों, कुछ अखबार वाले कुछ न्यूज़ चैनल अपनी औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराकर कर्तव्य की इतिश्री करेंगे और उधर भारतीय पूँजीवाद, विश्व साम्राज्यवाद की बाहों में बाहें डालकर जश्न मनाएगा।
    विगत 26 वर्षों के दौरान गैस पीड़ितों के प्रश्नों पर चली तमाम गतिविधियों की विवेचना करने पर एक जो महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है वह यह है कि आखिर क्यों कर गैस पीड़ितों का आन्दोलन एक विराट आन्दोलन के रूप  में उभरकर सामने नहीं आ पाया, जबकि इसमें भोपाल की गैस पीड़ित जनता के स्वास्थ्य, पुनर्वास, रोजगार और तो और सीमेंटिंग फैक्टर के रूप  में काम करने वाले राहत और मुआवजे़ का प्रश्न भी शामिल था, जिसका सहारा लेकर गैस पीड़ितों के आन्दोलन को प्रारम्भ से ही एक राजनैतिक लड़ाई की दिशा से पथभ्रष्ट किया गया। क्यों यह आन्दोलन एक ताकतवर आन्दोलन नही बन पाया जबकि इसमें ‘धन’ प्राप्ति की अपार सम्भावनाएँ मौजूद थीं। आमतौर पर यही पाया जाता है कि जब पैसा हासिल करने का मुद्दा सामने हो तो भारतीय जनमानस सक्रिय रूप से आन्दोलनों में भागीदारी निभाता है।
    इस प्रश्न के उत्तर में कई एक बिन्दु सामने आते हैं। पहला यह कि मध्यप्रदेश में राजनैतिक आन्दोलनों का कोई गौरवशाली इतिहास और परम्परा कभी रहीं नहीं इसलिए आम जनता केवल वोटर के रूप में जीती रही है, जिसका फायदा उठाकर जहाँ एक ओर तमाम संसदीय पार्टियों ने गैस पीड़ितों के आन्दोलन में पूँजीपति वर्ग के हितों की दलाली की मंशा-स्वरूप गैस पीड़ितों के आन्दोलन को नष्ट करने का काम किया वहीं गैर सरकारी संगठनों और उनके प्रतिनिधियों ने जनवादी राजनैतिक चेतना के अभाव में गैस पीड़ितों की लड़ाई को एक राजनैतिक लड़ाई के रूप  में खड़ा ना कर मामूली धरना-प्रदर्शन की औपचारिकता एवं कानूनी दांवपेचों में फँसाकर नष्ट करने का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारनामा अंजाम दिया। जनता की लड़ाइयों को अदालतों में ले जाकर सीमित कर देने वाले इन संगठनों से पूछा जाना चाहिए कि -‘‘क्या होता अगर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अदालतों में लड़ा जाता.........? इसका एक ही जवाब है कि भारतीय आम जनता युगों-युगों तक आज़ादी की साँस नहीं ले पाती।’’
    गैस पीड़ितों के सवालों पर मध्यप्रदेश और भारत सरकार की कुर्सियों पर समय-समय पर काबिज पार्टियों, ब्यूरोक्रेट्स, कानून, अदालत इत्यादि-इत्यादि ने जो विश्वासघात किये वे तो अपनी जगह पर हैं, और जब जन आन्दोलन कमज़ोर हो तो ये सभी संस्थाएँ ऐसे विश्वासघात करतीं ही हैं, परन्तु जो लोग लम्बे समय से गैस पीड़ितों के आंदोलन का नेतृत्व करने का भ्रम पाले हुए विगत 26 वर्षों से अपनी दुकानें चला रहे हैं, उन सभी को एक बार अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए कि क्या कारण है वे गैस पीड़ितों की लड़ाई का सफल प्रतिनिधित्व नहीं कर पाए। इस बात पर भी उन्हें मंथन करना चाहिए कि जब लड़ाई के मुद्दे समान हैं तो अलग-अलग ढेर सारे संगठनों की आखिर ज़रूरत क्या है ? क्यों नहीं वे तमाम छोटे-मोटे संगठन लड़ाई को साझी लड़ाई के रूप में आत्मसात कर मज़बूत बना पाते ? ज़ाहिर है वे सब भी अन्ततः उन लोगों के स्वार्थ को सधने दे रहे हैं जिनका ध्येय है कि गैस पीड़ितों की लड़ाई ताकतवर रूप में खड़ी होकर कभी भी उनके आड़े ना आ सके, और यह स्थार्थ यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन, अमरीकी साम्राज्यवाद और भारतीय पूँजीवाद के जनविरोधी गठबंधन के अलावा किसका हो सकता है ? गैस पीड़ितों के भीतर यह चेतना फूँकने वाला कोई नहीं, यहीं उनका दुर्भाग्य है।       

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

अरुंधति का अपराध इतना बड़ा भी नहीं है कि उनके साथ फासिस्ट तौर तरीकों से पेश आया जाए


     अरुधंति राय के बहाने तथाकथित राष्ट्रवादियों को फिर मौका मिल गया है राष्ट्र-राष्ट्र चिल्लाने का। कितने आश्चर्य की बात है कि जिस देश ने 200 साल तक अंग्रेज़ों के साथ कठिन संघर्ष करके यह स्वतंत्रता हासिल की है, उस देश में एक महिला का किसी की स्वतंत्रता की लड़ाई को समर्थन देना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि उसे फाँसी देने की माँग उठने लगी है। ज़ाहिर ऐसे लोगों का स्वतंत्रता की लड़ाई के साथ अवश्य ही कुछ लेना-देना नहीं रहा होगा।
            अरुधंति ने क्या गलती की इस पर बाद में चर्चा करेंगे, पहले देखें कि आखिर यह राष्ट्र आखिर किसे कहा जा रहा है। दुनिया जानती है कि अंग्रेज़ों के इस भूभाग पर कब्ज़ा करने के पहले भारत जैसा कोई भी देश अस्तित्व में नहीं था, यह कई सारे राजे-रजवाड़ों, रियासतों का एक समूह था जिसमें अलग-अलग भाषा, धर्म, सम्प्रदाय के लोगों का निवास था। सबका अपना आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आधार था, उनकी अपनी राष्ट्रीयता थी। अनेक राष्ट्रीयताओं के इस समूह को अंग्रेजों ने अपने साम्राज्यवादी इरादों के मद्देनज़र एक सूत्र में पिरोया जिसे इन्डिया कहा गया। स्वतंत्रता संग्राम हुआ तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ताकत से लोहा लेने के लिए इसी एक सूत्र में आबद्ध राजनैतिक ढॉचे के आधार पर स्वतंत्रता आन्दोलन का सूत्रपात हुआ जिसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन कहा गया। कालान्तर में जब गांधी जी के नेतृत्व में चले आन्दोलन के परिणाम स्वरूप अंग्रेज यह देश छोड़कर चले गए तो हमारी देशी सरकार को विरासत में वही साम्राज्यवादी नज़रिया देकर गए जिसके आधार पर भविष्य में भारत सरकार ने अपने गठन के बाद कई रियासतों को जबरदस्ती इस देश भारत का हिस्सा बना लिया। गोवा की बात अगर ना भी निकाली जाए क्योंकि वहाँ पुर्तगालियों का शासन था, और गोवा के लोग भारत की ताकत के दम पर उससे मुक्ति पाना भी चाहते थे लेकिन फिर भी मदद के बहाने भारत की गोवा को अपने अधीन कर लेने की विस्तारवादी कोशिशों के खिलाफ वहाँ कोई आन्दोलन नहीं हुआ हो ऐसी बात नहीं है। लेकिन, हैदराबाद में तो बाकायदा निज़ाम के खिलाफ भारतीय सेना को उतारा जाकर उसे ज़बरदस्ती संधीय भारत में शामिल किया गया। और भी ऐसी कई रियासतें रहीं है हम जानते हैं। प्रश्न यह है कि कश्मीर सहित ऐसी सारी रियासतों को जिन्हें भारत ने अपने अधीन ले लिया वहाँ की आम जनता से क्या पूछा गया कि वे क्या चाहते हैं ? कभी नहीं ?
            कश्मीर का सवाल भी इसी तरह का है। कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का नज़रिया क्या है और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का इस मुद्दे पर क्या स्टेंड है इसे दरकिनार रखकर, पूछा जाय तो क्या आज़ादी की महान लड़ाई लड़ चुके राष्ट्र को अपने अधीन किसी भी राज्य, जिसकी अपनी निजी राष्ट्रीयता है, जो सास्कृतिक, सामाजिक, रूप से अपनी एक निजी पहचान रखता है, की जनता से यह जान लेना क्या आवश्यक और प्रजातांत्रिक मूल्यबोधों के अनुरूप नहीं है कि वे क्या चाहते है ? या उन्हें हमेशा ही डंडे के दम पर यह कहा जाएगा कि अपने हक में स्वतंत्रता की बात करोगे तो राष्ट्रद्रोही करार दिये जाकर जेल में सड़ा दिया जाएगा। क्या यह नज़रिया तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के समान ही नहीं नज़र आता जो उस वक्त आज़ादी की माँग करने वालों को फॉसी पर चढ़ा दिया करते थे क्योंकि यह माँग उनकी साम्राज्यवादी मंसूबों पर पानी फेरने वाली माँग थी।
            आज यदि कश्मीर की आमजनता यह चाहती है कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए, तो इसे हम अपने प्रजातंत्र की नाकामी क्यों नहीं मानते ? क्यों नहीं हम यह स्वीकार कर लेते कि हमने अलग-अलग राष्ट्रीयताओं को मिलाकर एक राष्ट्र तो बना लिया मगर हम एक राष्ट्रीय संस्कृति विकसित करने में असफल रहे हैं जो हमारे अलग-अलग राष्ट्रीयताओं वाले देश को एक सूत्र में पिरो पाती। क्यों हमारे देश में अब भी भाषा, और प्रांतीय झगड़े मौजूद हैं। क्यों मुम्बई में मराठियों के द्वारा गैर मराठियों का जीना हराम किया जाता है। इसका जवाब एक ही है कि हमारा राजनैतिक और आर्थिक ढॉचा आज़ादी के बाद से लेकर अब तक मात्र और मात्र दोहन में लगा रहा है और अब भी लगा हुआ है। यदि हम प्रजातांत्रिक मूल्यबोधों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए एक राष्ट्रीय संस्कृति का विकास करने में सफल हुए होते तो ना तो कश्मीर का झंझट खड़ा होता और ना ही देश के और दूसरे कोने अपने आप में भीतर ही भीतर सुलग रहे होते।
            अरुंधति ने कश्मीर की स्वतंत्रता के मुद्दे को आम जनता का मुद्दा मानते हुए उसका समर्थन किया है। उन्हें यह नहीं मालूम कि किसी भी मुल्क की आम जनता कभी स्वयंस्फूर्त रूप से कुछ नहीं करती। पूँजीवाद के दौर में स्वतंत्रता का मुद्दा छोटे पूँजीवादियों का बड़े पूँजीखोरों के पंजे से मुक्ती का मुद्दा होता है। हिन्दुस्तान से अलग होकर पाकिस्तान बनने की भी यही कहानी थी, भारतीय पूँजीवाद जिसके हाथों अंग्रेज सत्ता का हस्तांतरण कर गए थे पाकिस्तान का स्थानीय पूँजीपति असुरक्षित महसूस करता था, इसीलिए उसने अपने विकास के लिए अलग राष्ट्र के सिद्धांत को अपनाया। बांगलादेश बनने की भी यही कहानी है। पूर्वी बंगाल में छोटे पूँजीपति चूँकि पाकिस्तानी पूँजी के हाथों बरबाद हो रहे थे तो उसने अपने दादा भारतकी मदद से अपने आप को पाकिस्तान के पंजे से छुड़ा लिया, और भारत में शामिल होने की बजाय स्वतंत्र अस्तित्व का चुनाव किया।
            अरुंधति को यह समझना चाहिए था कि असली मुक्ति किस चीज़ में है। कश्मीर की आम जनता तब तक सुखी नहीं हो सकती जब तक पूँजीवाद का अंत नहीं होता। कश्मीरी स्थानीय पूँजीवाद पाकिस्तानी पूँजी के दम पर कितना भी उछलता रहे मगर वहाँ की आम जनता को तभी सुख मिलेगा जब उसके आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक हित पूँजीवादी ताकतों से छुटकारा पा सकें। अरुंधति को यह जानना चाहिए, और वे शायद अच्छी तरह जानती हैं कि यह देश घोर प्रजांतांत्रिक अवमूल्यन की समस्या से पीड़ित है, समानता यहाँ दूभर हो चुकि है, आर्थिक विषमता एक पाटी ना जा सकने वाली खाई के समान है, और यह कश्मीर समेत पूरे देश की समस्याएँ है। ऐसी स्थिति में कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन जो कि किसी भी सूरत में वहाँ की आम जनता मजदूर वर्ग का आंदोलन नहीं है, भारतीय पूँजीवाद की छत्रछाया में छटपटाते कश्मीरी पूँजीवाद का आन्दोलन मात्र ही उसे कहा जा सकता है तब उन्होंने उनके सुर में सुर मिला कर अच्छा तो खैर किसी दृष्टि से नहीं किया, लेकिन फिर भी उनका अपराध इतना बड़ा भी नहीं है कि उनके साथ फासिस्ट तौर तरीकों से पेश आया जाए, फॉसी देने की बात की जाए। वे सही कह रहीं है, देश में इस समय नाना तरीके के देशद्रोह के अपराधी खुले आम घूम रहे हैं उन्हें छुट्टा छोड़कर देश की एक प्रबुद्ध महिला को इस तरह राष्ट्रवाद के नाम पर प्रताड़ित किया जाए, ऐसा राष्ट्रवाद अपनी तो समझ के परे है।               

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेन्च के फ़ैसले पर जलेस, प्रलेस और जसम का साझा बयान

बाबरी मस्जिद स्थल के बारे में लखनऊ बेन्च के फ़ैसले पर जलेस, प्रलेस और जसम का साझा बयान
            रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच का फ़ैसला इस देश के हर इंसाफ़पसंद नागरिक के लिए दुख और चिंता का सबब है। इस फ़ैसले में न सिर्फ तथ्यों, सबूतों और समुचित न्यायिक प्रक्रिया की उपेक्षा हुई है, बल्कि धार्मिक आस्था को अदालती मान्यता देते हुए एक ऐसी नज़ीर पेश की गयी है जो भविष्य के लिए भी बेहद ख़तरनाक है। इस बात का कोई साक्ष्य न होते हुए भी, कि विवादित स्थल को हिंदू आबादी बहुत पहले से भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मानती आयी है, फ़ैसले में हिंदुओं की आस्था को एक प्रमुख आधार बनाया गया है। अगर इस आस्था की प्राचीनता के बेबुनियाद दावों को हम स्वीकार कर भी लें, तो इस सवाल से तो नहीं बचा जा सकता कि क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया ऐसी आस्थाओं से संचालित होगी या संवैधानिक उसूलों से? तब फिर उस हिंदू आस्था के साथ क्या सलूक करेंगे जिसका आदिस्रोत ऋग्वेद का ‘पुरुषसूक्त’ है और जिसके अनुसार ऊंच-नीच के संबंध में बंधे अलग-अलग वर्ण ब्रह्मा के अलग-अलग अंगों से निकले हैं और इसीलिए उनकी पारम्परिक ग़ैरबराबरी जायज़ है? अदालत इस मामले में भारतीय संविधान से निर्देशित होगी या आस्थाओं से? तब स्त्री के अधिकारों-कर्तव्यों से संबंधित परम्परागत मान्यताओं के साथ न्यायपालिका क्या सलूक करेगी? हमारी अदालतें सती प्रथा को हिंदू आस्था के साथ जोड़ कर देखेंगी या संविधानप्रदत्त अधिकारों की रोशनी में उस पर फ़ैसला देंगी? कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था को विवादित स्थल संबंधी अपने फ़ैसले का निर्णायक आधार बना कर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘मनुस्मृति’ और ‘पुरुषसूक्त’ समेत हिंदू आस्था के सभी स्रोतों को एक तरह की वैधता प्रदान की है, जिनके खि़लाफ़ संघर्ष आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण का एक अनिवार्य अंग रहा है और हमारे देश का संविधान उसी आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना की मूर्त अभिव्यक्ति है। इसलिए आस्था को ज़मीन की मिल्कियत तय करने का एक आधार बनाना संवैधानिक उसूलों के एकदम खि़लाफ़ है और इसमें आने वाले समय के लिए ख़तरनाक संदेश निहित हैं। ‘न्यायालय ने भी आस्था का अनुमोदन किया है’, ऐसा कहने वाले आर एस एस जैसे फासीवादी सांप्रदायिक संगठन की दूरदर्शी प्रसन्नता समझी जा सकती है!
           यह भी दुखद और चिंताजनक है कि विशेष खंडपीठ ने ए।एस.आई. की अत्यंत विवादास्पद रिपोर्ट के आधार पर मस्जिद से पहले हिंदू धर्मस्थल होने की बात को दो तिहाई बहुमत से मान्यता दी है। इस रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ‘स्तंभ आधारों’ के होने का दावा किया गया है, जिसे कई पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों ने सिरे से ख़ारिज किया है। यही नहीं, ए.एस.आई. की ही एक अन्य खुदाई रिपोर्ट में उस जगह पर सुर्खी और चूने के इस्तेमाल तथा जानवरों की हड्डियों जैसे पुरावशेषों के मिलने की बात कही गयी है, जो न सिर्फ दीर्घकालीन मुस्लिम उपस्थिति का प्रमाण है, बल्कि इस बात का भी प्रमाण है कि वहां कभी किसी मंदिर का अस्तित्व नहीं था। निस्संदेह, ए.एस.आई. के ही प्रतिसाक्ष्यों की ओर से आंखें मूंद कर और एक ऐसी रिपोर्ट परं पूरा यकीन कर जिसे उस अनुशासन के चोटी के विद्वान झूठ का पुलिंदा बताते हैं, इस फ़ैसले में अपेक्षित पारदर्शिता एवं तटस्थता का परिचय नहीं दिया गया है।
          हिंदू आस्था और विवादास्पद पुरातात्विक सर्वेक्षण के हवाले से यह फ़ैसला प्रकारांतर से उन दो कार्रवाइयों को वैधता भी प्रदान करता है जिनकी दो-टूक शब्दों में निंदा की जानी चाहिए थी। ये दो कार्रवाइयां हैं, 1949 में ताला तोड़ कर षड्यंत्रपूर्वक रामलला की मूर्ति का गुंबद के नीचे स्थापित किया जाना तथा 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना। आश्चर्य नहीं कि 1992 में साम्प्रदायिक ताक़तों ने जिस तरह कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं और 500 साल पुरानी एक ऐतिहासिक इमारत को न सिर्फ धूल में मिला दिया, बल्कि इस देश के आम भोलेभाले नागरिकों को दंगे की आग में भी झोंक दिया, उसके ऊपर यह फ़ैसला मौन है। इस फ़ैसले का निहितार्थ यह है कि 1949 में जिस जगह पर जबरन रामलला की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया, वह जायज़ तौर पर रामलला की ही ज़मीन थी और है, और 1992 में हिंदू सांप्रदायिक ताकतों द्वारा संगठित एक उन्मादी भीड़ ने जिस मस्जिद को धूल में मिला दिया, उसका ढहाया जाना उस स्थल के न्यायसंगत बंटवारे के लिए ज़रूरी था! हमारे समाज के आधुनिक विकास के लिए अंधविश्वास और रूढि़वादिता बड़े रोड़े हैं जिनका उन्मूलन करने के बजाय हमारी न्यायपालिका उन्हीं अंधविश्वासों और रूढि़वादिता को बढ़ावा दे तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है!
         लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच में यक़ीन करने वाले हम लेखक-संस्कृतिकर्मी, विशेष खंडपीठ के इस फ़ैसले को भारत के संवैधानिक मूल्यों पर एक आघात मानते हैं। हम मानते हैं कि अल्पसंख्यकों के भीतर कमतरी और असुरक्षा की भावना को बढ़ाने वाले तथा साम्प्रदायिक ताक़तों का मनोबल ऊंचा करने वाले ऐसे फ़ैसले को, अदालत के सम्मान के नाम पर बहस के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। इसे व्यापक एवं सार्वजनिक बहस का विषय बनाना आज जनवाद तथा धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए सबसे ज़रूरी क़दम है।

हस्ताक्षरकर्ता मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
कमला प्रसाद, महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
मैनेजर पाण्डेय, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच
चंचल चौहान, महासचिव, जनवादी लेखक संघ
आली जावेद, उप महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

जन संस्कृति मंच, लखनऊ की पत्रिका के ब्लॉग जसम लखनऊ से साभार।

रविवार, 12 सितंबर 2010

गणपति बप्पा : ईश्वर कहीं नहीं, सिवा इन्सानी दिमाग के

       दुनिया के सबसे अनोखे देव इस समय भारतवर्ष के कुछ गली कूचों में आ बिराजे हैं, भक्त समाज अपने दिमाग की खिड़कियाँ बंदकर उनकी भक्ति में लीन हो गया है। आठ दस दिन बाद इन्हें नदी तालाबों में विसर्जित कर प्रदूषण बढ़ाया जाएगा।
    भारतीयों की उदारता का कोई जवाब नहीं है। वे प्रत्येक असंभव बात पर आँख बंदकर विश्वास कर लेते हैं यदि उसमें ईश्वर की महिमा मौजूद हो। पार्वती जी ने अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया और नहाने की क्रिया के दौरान कोई ताकाझांकी ना करे इसलिए उस पुतले में प्राण फूँक कर उसे पहरे पर बिठा दिया। ऐसा कितना मैल पार्वती जी के शरीर से निकला होगा इस प्रश्न पर ना जाकर यह सोचा जाए कि पुतले में कैसे कोई प्राण फूँक सकता है, लेकिन चूँकि वे भगवान शिव की पत्नी थीं सो उनके लिए सब संभव था। दूसरा प्रश्न, भगवान की पत्नी को भी ताकाझांकी का डर ! बात कुछ पचती नहीं। किसकी हिम्मत थी जो इतने क्रोधी भगवान की पत्नी की ओर नहाते हुए ताकझांक करता !
    खैर, ज़ाहिर है कि चूँकि पुतला तत्काल ही बनाया गया था सो वह शिवजी को कैसे पहचानता ! पिता होने का कोई भी फर्ज़ उन्होंने उस वक्त तक तो निभाया नहीं था ! माता के आज्ञाकारी पुतले ने शिवजी को घर के अन्दर घुसने नहीं दिया तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन उड़ा दी। उस वक्त कानून का कोई डर जो नहीं था। पार्वती जी को पता चला तो उन्होंने बड़ा हंगामा मचाया और ज़िद पकड़ ली की अभी तत्काल पुतले को ज़िदा किया जाए, वह मेरा पुत्र है। शिवजी को पार्वती जी की ज़िद के आगे झुकना पड़ा परन्तु भगवान होने के बावजूद भी वे गुड्डे का सिर वापस जोड़ने में सक्षम नहीं थे। सर्जरी जो नहीं आती थी। परन्तु शरीर विज्ञान के नियमों को शिथिल कर अति प्राकृतिक कारनामा करने में उन्हें कोई अड़चन नहीं थी, आखिर वे भगवान थे। उन्होंने हाल ही में जनी एक हथिनी के बच्चे का सिर काटकर उस पुतले के धड़ से जोड़ दिया। ना ब्लड ग्रुप देखने की जरूरत पड़ी ना ही रक्त शिराओं, नाड़ी तंत्र की भिन्नता आड़े आई। यहाँ तक कि गरदन का साइज़ भी समस्या नहीं बना। पृथ्वी पर प्रथम देवता गजानन का अविर्भाव हो गया।
  
प्रथम देवता की उपाधि की भी एक कहानी बुज़र्गों के मुँह से सुनी है। देवताओं में रेस हुई। जो सबसे पहले पृथ्वी के तीन चक्कर लगाकर वापस आएगा उसे प्रथम देवता का खिताब दिया जाएगा। उस वक्त पृथ्वी का आकार यदि देवताओं को पता होता तो वे ऐसी मूर्खता कभी नहीं करते। गणेशजी ने सबको बेवकूफ बनाते हुए पार्वती जी के तीन चक्कर लगा दिए और देवताओं को यह मानना पड़ा कि माँ भी पृथ्वी तुल्य होती है। गणेश जी को उस दिन से प्रथम देवता माना जाने लगा। बुद्धि का देवता भी उन्हें शायद तभी से कहा जाने जाता है, उन्होंने चतुराई से सारे देवताओं को बेवकूफ जो बनाया। आज अगर ओलम्पिक में अपनी मम्मी के तीन चक्कर काटकर कोई कहें कि हमने मेराथन जीत ली तो रेफरी उस धावक को हमेशा के लिए दौड़ने से वंचित कर देगा।  आज का समय होता तो मार अदालतबाजी चलती, वकील लोग गणेश जी के जन्म की पूरी कहानी को अदालत में चेलेन्ज करके माँ-बेटे के रिश्ते को ही संदिग्ध घोषित करवा देते।
    बहरहाल, इस बार भारत में गणेशजी ऐसे समय में बिराजे हैं जबकि दुनिया में ईश्वर है या नहीं बहस तेज हो गई है। इस ब्रम्हांड को ईश्वर ने बनाया है कि नहीं इस पर एक वैज्ञानिक ने संशय जताया जा रहा है जिसे पूँजीवादी प्रेस प्रचारित कर रहा है। जो सत्य विज्ञान पहले से ही जानता है और जिसे जानबूझकर मानव समाज से छुपाकर रखा गया है, उसे इस नए रूप में प्रस्तुत करने के पीछे क्या स्वार्थ हो सकता है सोचने की बात यह है। क्या विज्ञान की सभी शाखाओं को समन्वित कर प्रकृति विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के सत्यों को पहले कभी उद्घाटित नहीं किया गया ? किया गया है, परन्तु यह काम मार्क्सवाद ने किया है, इसीलिए वह समस्त विज्ञानों का विज्ञान है, परन्तु चूँकि वह शोषण से मुक्ति का भी विज्ञान है, इसलिए उसे आम जनता से दूर रखा जाता है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद-ऐतिहासिक भौतिकवाद को लोगों से छुपाकर रखा जाता है, जबकि अगर कोई सचमुच सत्य को खोजना चाहता है तो इस सर्वोन्नत विज्ञान को जानना बहुत ज़रूरी है।
    लोग ईश्वर की खोज के पीछे पड़े हैं। हम कहते हैं कि ईश्वर की समस्त धारणाएँ धर्म आधारित हैं, तो पहले यह खोज कीजिए कि धर्म कहाँ से आया, कैसे आया। धार्मिक मूल्य अब इस जम़ाने में मौजू है या नहीं। मध्ययुगीन धार्मिक मूल्यों के सामने आधुनिक मूल्यों का दमन क्यों किया जाता है। यदि आप यह समझ गए कि अब आपको मध्ययूगीन धार्मिक मूल्यों की जगह नए आधुनिक मूल्यों की आवश्यकता है जो वैज्ञानिक सत्यों पर आधारित हों, तो ईश्वर की आपको कोई ज़रूरत नहीं पडे़गी।
    एक मोटी सी बात लोगों के दिमाग में जिस दिन आ जाएगी कि ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने ईश्वर को बनाया है, सारे अनसुलझे प्रश्न सुलझ जाऐंगे। क्योंकि पदार्थ (मस्तिष्क) इस सृष्टी में पहले आया, विचार बाद में। ईश्वर मात्र एक विचार है, उसका वस्तुगत अस्तित्व कहीं, किसी रूप में नहीं है, सिवा इन्सान के दिमाग के।

रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस : क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ‘शिक्षकों’ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए

    आज शिक्षक दिवस है। सारे अखबार या तो शिक्षकों की बदहाली अथवा प्रशंसा से भरे हुए हैं। अच्छी बात है, जो शिक्षक हमें एक सफल सामाजिक प्राणी बनाने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका निभाकर एक महान कार्य करता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना एक सुशिक्षित व्यक्ति के लिए लाज़मी है और दूसरी और इस महती सामाजिक कार्य की जिम्मेदारी उठाने वाली महत्वपूर्ण इकाई के प्रति सरकार के असंवेदनशील रुख की भर्त्सना करना भी उतना ही ज़रूरी है।
    सरकार का शिक्षकों को दोयम दर्ज़े के सरकारी कर्मचारी की तरह ट्रीट करना, उनके वेतन, भत्तों, सुख-सुविधाओं के प्रति दुर्लक्ष्य करना, उन्हें जनगणना, पल्स पोलियों, चुनाव आदि-आदि कार्यों में उलझाकर शिक्षा के महत्वपूर्ण कार्य से विमुख करना, इनके अलावा और भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो एक शिक्षक की भूमिका और महत्व को सिरे से खारिज करते से लगते हैं। लेकिन, इस सबसे परे, शिक्षकों की अपनी कमज़ोरियों, अज्ञान, कुज्ञान, अवैज्ञानिक चिंतन पद्धति, भ्रामक एवं असत्य धारणाओं के वाहक के रूप में समाज में सक्रिय गतिशीलता के कारण आम तौर पर मानव समाज का और खास तौर पर भारतीय समाज का कितना नुकसान हो रहा है, यह हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है।
    पिछले दो-तीन सौ साल मानव सभ्यता के करोड़ों वर्षों के इतिहास में, विज्ञान के विकास की स्वर्णिम समयावधि रही है। इस अवधि में प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के अधिकांश रहस्यों पर से पर्दा उठाकर सभ्यता ने व्यापक क्रांतिकारी करवटें ली हैं। एक अतिप्राकृतिक सत्ता की अनुपस्थिति का दर्शन भी इसी युग में आविर्भूत हुआ है जिसकी परिणति दुनिया भर में मध्ययुगीन सामंती समाज के खात्में के रूप में हुई थी जिसका अस्तित्व ही ईश्वरीय सत्ता की अवास्तविक अवधारणा पर टिका हुआ था।
    भारतीय समाज में सामंती समाज की अवधारणाओं, मूल्यों का पूरी तौर पर पतन आज तक नहीं हो सका है और ना ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की समझदारी, आधुनिक चिंतन, विचारधारा का व्यापक प्रसार ही हो सका है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस समाज में ’सत्य-सत्य‘ का डोंड सामंती समय से ही पीटा जाता रहा हो उस समाज में ’सत्य‘ सबसे ज़्यादा उपेक्षित रहा है।
    हमें आज़ाद हुए 62 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। क्या शिक्षक का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ? क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’शिक्षकों‘ की नहीं थी ? क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’शिक्षकों‘ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः शिक्षकों के ही सिर पर है।
    अब भी समय है, प्रकृति मानव समाज एवं विश्व ब्रम्हांड के सत्य को गहराई में जाकर समझने और एकीकृत ज्ञान के आधार पर भारतीय समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने की लिए प्रत्येक शिक्षक आज भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते वह अपने तईं ना केवल ईमानदार हो बल्कि सत्य के लिए प्राण तक तजने को तैयार हो।

रविवार, 8 अगस्त 2010

मुनि जी का अनर्गल प्रलाप ; क्या यह चुप्पी खतरनाक नहीं है।

          भोपाल में इन दिनों पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोग एक दिगम्बर मुनि के कड़वे प्रवचनों का आनन्द ले रहे हैं। वे दिगम्बर मुनि जब बैंडबाजे के साथ सड़क से गुज़रते हैं तो उनके अनुयाई महिला पुरुष तो श्रद्धा से सिर झुका लेते हैं मगर समाज के दूसरे वर्गों के लोगों को खासकर महिलाओं को परेशानी होती है या वे उन्हीं पागलों की तरह इन दिगम्बर मुनि जी को भी नज़रअन्दाज़ करती चलती हैं जो शहर में विक्षिप्त हालत में अपने बदन पर से कपड़े उतार फेंककर अक्सर यहाँ वहाँ घूमते दिखाई देते रहते हैं, यह एक प्रश्न है।
          एक सुसंस्कृत समाज में जहाँ भाँति भाँति के धर्म और सम्प्रदाय के लोग रहते हैं, महज़ धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर किसी को इस तरह सड़क पर निर्वस्त्र घूमने की इजाज़त दी जानी चाहिए या नहीं इस प्रश्न को उठाने से परहेज करते हुए इससे भी बड़ा एक प्रश्न उठाने की आवश्यकता महसूस हो रही है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी कुछ भी ऊटपटांग बोलने की इजाज़त दी जानी चाहिए या धार्मिक प्रवचनों की आड़ में किसी प्रकार की अविवेकपूर्ण बातों को बर्दाश्त किया जाना चाहिए ?
          मुनि जी कहते हैं कि विधानसभा में खतरनाक लोग होते हैं, यह बात सुनकर सरकार के मुखिया से लेकर सारे राजनीतिज्ञ मंद मंद मुस्कुराते हुए मुनि जी से आशीर्वाद लेने के लिए लाइन लगाकर खड़े रहते हैं, उनमें से किसी के चेहरे पर मुनि जी के इस जुमले से कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं देता। मुनि जी के कड़वे प्रवचन सुनने वाले प्रबुद्ध लोग भी इस बात से मंद मंद मुस्कुराकर रह जाते हैं, उनके चेहरे पर भी इस बात से कोई शिकन नहीं आती। ज़ाहिर है इस सत्य से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता मगर यह सत्य आम जनसाधारण के लिए कितना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसके कल्याण के लिए विधानसंभाएँ या संसद के ज़रिए प्रजातांत्रिक कर्त्तव्यों का निर्वहन किया जाता है। जब वहाँ खतरनाक लोग बैठे होंगे जिसका अर्थ है गुंडे, बदमाश, असामाजिक तत्व बैठे होंगे तो फिर आम जनता का क्या हश्र होगा यह समझा जा सकता है, मगर मुनि जी को इस संबंध में आगे कुछ नहीं कहना है।
          मुनि जी कहते हैं कि ’’अगर आप झुकना नहीं जानते तो फिर समझ लो की मुर्दा हो गए, क्योंकि मुर्दा ही ऐसा होता है जो कि झुकता नहीं।’’ अनुभवी लोग यही बात दूसरे अन्दाज़ में कहते हैं जब अंधड़ चलता है तो दूब-घास का कुछ नहीं बिगड़ता क्यों कि वह ज़मीन पर लेट जाती है परन्तु बड़े-बडे़ पेड़ जड़ से उखड़ जाते हैं। यहाँ घास के उदाहरण से जहाँ यह बात स्पष्ट होती है कि आंधी गुज़रते ही जिस तरह घास दोबारा उठ खड़ी होती है फिर उसी तरह तनकर खड़े हो जाओ, वहीं मुनि जी के प्रवचन से यह समझ में आता है कि-अन्याय अत्याचार के सामने झुकना सीखो, गुंडे-बदमाश, असामाजिक तत्व जब दबाने की कोशिश करे तो उनके सामने झुक जाओ, देश में इतना कुछ अनाचार, झूठ-फरेब चल रहा है उस सबके सामने झुक जाओ, वर्ना मुर्दा कहलाओगे।
          एक दिन वे कह रहे थे, ‘‘यह देश बदलने वाला नहीं है इसलिए बेहतर है तुम खुद ही बदल जाओं।’’ इसका भी यही अर्थ है कि इस देश में जो सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ वर्तमान में मौजूद है वे कभी बदलने वाली नहीं है इसलिए तुम भी उन परिस्थितियों के गुलाम हो जाओ, उनके अनुसार आचरण करो। इसका अर्थ यह भी होता है कि देश में जात-पात, धर्म सम्प्रदाय के नाम पर राष्ट्रीय हितों को ताक पर रख देते हैं, तुम भी रखो, एक दूसरे की गरदने काटते हैं तुम भी काटो, राजनीति में नीति नैतिकता की जो जर्जरता देखी जा रही है तुम भी उसी में लिप्त हो जाओ, आम जनता का खून चूसो, जिस तरह देश का पूँजीपति वर्ग आम जनता का आर्थिक शोषण कर रहा है तुम भी करों, सभी उत्कृष्ट मूल्यों को तिलांजलि देकर एक जानवर की तरह का जो आचरण आजकल जन मानस में देखा जा रहा है, तुम भी उसी तरह का आचरण अपना लो, आदि आदि।
          रोजाना वे दिगम्बर मुनि इस प्रकार की ऊटपटांग बातें करते रहते हैं और भी कई स्वयंभू गुरु इस तरह कि आधारहीन, अवैज्ञानिक बातों से पढ़े-लिखे लोगो तक को भरमाते रहते हैं, मगर सबसे ज्यादा ताज़्जुब की बात यह है कि देश के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, प्रगतिशील राजनैतिक पार्टियाँ, मानव अधिकार संगठन, महिला संगठन, और तमाम व्यक्तिगत एवं संस्थागत रूप से सामाजिक जद्दोजहद में लगे लोग इस विषय में चुप्पी साधे रहते हैं। क्या यह चुप्पी खतरनाक नहीं है।    

शुक्रवार, 11 जून 2010

क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????

सभी चित्र दैनिक भास्कर से साभार
घड़ियाली आँसू
कौन लेकर रहेगा इंसाफ ?26 साल पहले ये सब कहाँथे जब भोपाल के चंद कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजसेवियों ने गैस पीड़ितों के कंधे से कंधा मिलाकर उनके लिए संघर्ष किया, पुलिस प्रशासन का अत्याचार सहा, लाठियाँ खाई, जेल तक गए। तब ये सारे घड़ियाली आँसू बहाने वाले लोग कहाँ थे ?
मध्यप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी और उसके सांसद विधायक तत्कालीन कांग्रसी नेताओं को कटघरे में खड़ा कर उनके मज़े ले रहे हैं। सच्चाई यह है कि उनके दामन भी उतने ही दागदार हैं जितने कांग्रसियों के। इन 26 सालों में केन्द्र में और मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकार लम्बे समय तक रहीं, उन्होंने इस मुदृदे पर क्या किया यह भी जगजाहिर है।  हर बार चुनाव आने पर उन्होंने पूरे भोपाल को मुवावज़ा बटवाने का सपना दिखाकर वोट हासिल किए।
अब जब कि सारी बातों का खुलासा हो गया है क्या शिवराज सरकार में नैतिक साहस है कि वे सरकारी मशीनरी के उन तमाम  अफसरों और राजनीतिज्ञो के ऊपर शिकंजा कसे जिन्होने भोपाल की जनता के साध विश्वासघात किया ?

 
 और भी ना जाने कौन कौन ? 

क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????
इन सब को सज़ा कौन देगा ???

गुरुवार, 10 जून 2010

ये हैं नाइंसाफी के जवाबदेह

भोपाल के गैस पीड़ितों ने उनके साथ हुई नाइन्साफी के लिए इन लोगों को जिम्मेदार ठहराया है
(फोटो दैनिक भास्कर से साभार)

क्या क्या हुआः-
-घनी आबादी के बीच में अमानक स्तर का कारखाना चलाने देने, और खतरनाक, पाबंदी वाले उत्पादनों का कारोबार बेराकटोक चलते रहने देने के लिए आज तक किसी को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास राज्य और केन्द्र सरकार की तरफ से नहीं हुआ।जबकि इस मामले में दोषी औ?ोगिक इन्सपेक्टर से लेकर तत्काली मुख्यमंत्री तक सबको कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।

-हादसे के बाद गैस पीड़ितों की किसी भी प्रकार की कानूनी लड़ाई को लड़ने का अधिकार अपने हाथ में लेकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हाथ काट दिए।

- गैस त्रासदी  की विभिषिका को वास्तविकता से बेहद कम आंका जाकर अदालत के सामने प्रस्तुत किया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड सस्ते में छूटे।

-मरने वालों और प्रभावितों की संख्या को काफी कम दिखाया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड को कम से कम आर्थिक नुकसान हो।

-गैस के ज़रिए फैले ज़हर के बारे में जानकारियाँ छुपा कर रखी गई, कारण गैसपीड़ितों के शरीर पर पडने वाले दूरगामी परिणामों संबंधी समस्त शोधों को छुपाकर रखा गया ताकि यूनीयन कार्बाइड को लाभ पहुँचे।

-हादसे के बाद दोषियों को बचाने की भरपूर कोशिश की गई।जिसमें एंडरसन को बचाने का अपराध तो जगजाहिर हो गया है।

भोपाल की आम जनता को मुआवज़ा और राहत के जंजाल में फंसाकर वास्तविक समस्याओं से उनका ध्यान हटाया गया और इसमें दलाल किस्म के संगठनों ने विदेशी पैसों के दम पर अपनी  भूमिका निभाई।

-अब भी जब बेहद कम सज़ा पाने के कारण देश-दुनिया में नाराज़गी है चारों ओर घड़ियाली आँसू बहाए जा रहे है, समितियाँ बन रहीं है।इसमें मीड़िया और प्रेस भी शामिल है जिसने 26 सालों तक इस मामलें को जनता की स्मृति से धोने का काम किया।

-आगे और लम्बे समय तक एक और मुकदमें में मामले को ले जाने के कोशिशें हो रहीं हैं, ताकि तब तक तमाम दोषी मर-खप जाएँ और मामला शांत हो जाए।

यह सब कुछ नहीं होता अगर गैस पीड़ितों को एक सशक्त आंदोलन अस्तित्व में होता। भोपाल की गैस पीड़ित आम जनता को यदि सही तरह से संगठित किया जाता तो ना गैस पीड़ितों में दलाल संगठन पनप पाते, ना राजनैतिक दलों द्वारा मामले को दबाने के प्रयास हो पाते, ना सरकारी मशीनरी को मनमानी करने की छूट मिल पाती और ना ही शासन-प्रशासन के स्तर पर देशदोह श्रेणी का अपराध करने की हिम्मत होती।


मंगलवार, 8 जून 2010

भोपाल गैस त्रासदी-कानून का रास्ता पकड़ने वाले जन आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण सबक


26 साल के लम्बे इन्तज़ार के बाद आखिर भोपाल गैस त्रासदी के अपराधियों पर चल रहे मुकदमें का अपेक्षित फैसला आ गया। जिस गंभीर आपराधिक मामले में राज्य और केन्द्र सरकार की एजेंसियाँ शुरु से ही अपने पूँजीवादी वर्ग चरित्र के अनुरूप अपने साम्राज्यवादी आंकाओं को बचाने में लगी थी, उसका हश्र इससे कुछ जुदा होता तो ज़्यादा आश्चर्य की बात होती।
भोपाल गैस त्रासदी उन्ही दिनों की बात है जब भूमंडलीकरण के साम्राज्यवादी षड़यंत्र के रास्ते अमरीका और दीगर मुल्क दुनिया के गरीब मुल्कों में पांव पसारने पर आमादा हो गए और इससे हमारे देश के पूँजीपतियों को भी दुनिया के दूसरे देशों में अपने पांव पसारने का मौका मिला। ऐसे में हज़ारों लोगों की बलि लेने वाली और लाखों लोगों को जीवन भर के लिए बीमार बना देने वाली अमरीकी कम्पनी यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन और उसकी भारतीय ब्रांच यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड को नाराज़ करके तत्कालीन राजीव गांधी सरकार भारतीय पूँजीपतियों की विश्वव्यापी कमाई को बट्टा कैसे लगा सकती थी ? लिहाज़ा भोपाल की आम जनता को निशाना बनाया गया। गैस त्रासदी के भयानक अपराध से संबंधित किसी भी तरह की न्यायिक कार्यवाही को बाकायदा  कानून पास करके केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और भोपाल की आम जनता की आवाज को कुंद कर दिया। फिर शुरू हुआ अपने ही देश के नागरिकों के साथ दगाबाजी का लम्बा कार्यक्रम जिसका प्रथम पटाक्षेप कल भोपाल की अदालत में हुआ। एक दो पटाक्षेप हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में और होंगे और भोपाल की जनता की आवाज़ को पूरी तौर पर दमित कर दिया जायगा। यही पूँजीवादी व्यवस्था का चरित्र है।
    मगर आज यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या पूँजीवादी व्यवस्था के इस चरित्र को भोपाल की आम जनता और उनका आंदोलन चलाने वाले जन संगठन समझ नहीं पाए ? क्या आज से 26 साल पहले कानून और प्रशासन का चरित्र कुछ अलग था ? क्या उस समय सरकार, प्रशासन, कानून में बैठे लोग आम जनता के हितैशी हुआ करते थे ? जवाब है नहीं । फिर क्यों जनसंगठनों ने न्यायिक लड़ाई पर भरोसा करके एक उभरते सशक्त जनआंदोलन को कानून और अदालत में ले जाकर कुंद कर दिया ?
क्या कल के इस ऐतिहासिक जनविरोध फैसले से यह स्पष्ट नहीं है कि इस देश की व्यवस्था की मशीनरी के किसी भी कलपुर्जे को, देश की आम जनता की ना तो कोई फिक्र है और ना ही उसके प्रति किसी प्रकार की प्रतिबद्धता की चिंता। देश के कानून, शासन, प्रशासन, और किसी भी संस्थान को आम जनता के गुस्से से कोई डर नहीं लगता, क्योंकि आम जनता को सही मायने में संगठित करने का काम अब इस देश कोई नहीं करता,  और जब आम जनता संगठित ना हो, सही राजनैतिक चेतना से लैस ना हो तो उसके बीच ऐसे जनविरोधी संगठन भी पनपते हैं जो जन आंदोलनों को जनतांत्रिक आंदोलन का नाम देकर  अदालतों में ले जाकर फंसा देते हैं ताकि मुकदमा खिचते खिचते इतना समय ले लें कि किसी को ध्यान ही ना रहे कि हम लड़ क्यों रहे थे।
भोपाल में भी कमज़ोर जन आन्दोलन का नतीजा 26 साल के लम्बे इन्तज़ार के बाद महज़ कुछ सालों की सज़ा पाकर, जमानत पा गए उन अपराधियों और भोपाल के ठगे गए गैस पीडितों के चेहरों से पढ़ा जा सकता है।
उम्मीद है अब भी कोर्ट-कचहरी, प्रेस-मीडिया, और छद्म आंदोलन के छाया से निकलकर गैस पीड़ित और उनके संगठन कोई ताकतवर जन आन्दोलन खड़ा करने की तैयारी करेंगे, ताकी आगे होने वाले फैसलों को जनता के हित में प्रभावित किया जा सके।    

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