रविवार, 6 दिसंबर 2009

मंदिर-मस्ज़िद के बहाने क़त्लेआम का जवाब लो

आज 6 दिसम्बर है, बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस की १७ वी वर्षगांठ। आज ही के दिन कुछ धार्मिक उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद को ढहाकर देश में हिन्दु-मुस्लिम नफरत के एक और अध्याय की शुरूआत की थी। हिन्दुओं ने पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजघराने के राजा रामचंद्र की तथाकथित जन्मभूमि पर, मंदिर निर्माण के मुद्दे को और मुसलमानों ने एक अज्ञात-अंजानी शक्ति ‘अल्लाह’ की इबादतगाह की रक्षा को अपनी-अपनी अस्मिता के प्रश्न से जोड़कर जी भरकर मानवता का खून बहाया है।

इस नाजुक मौके पर कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा की जाना गैरवाजिब नहीं होगा। हो सकता है ये बातें कुछ लोगों को बुरी लगे परन्तु मनुष्य मात्र के भले के लिए इसे बहस का मुद्दा बनाया जाना ज़रूरी है।
यदि उनका अस्तित्व था भी तो, पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजा की स्तुति-अंधभक्ति का आज इक्कीसवी शताब्दी में क्या औचित्य है यह समझ से परे है, जबकि सामंती युग को तिरोहित हुए अर्सा हो गया है। उस युग की सामंती परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यबोधों का वर्तमान प्रजातांत्रिक परिवेश में कोई महत्व ना होने के बावजूद हम क्यों आस्था के बहाने उस एक नाम को ढोते चले जा रहे हैं ? इतना ही नहीं आज जबकि आधुनिक युग के सामाजिक मूल्यबोधों, धर्मनिरपेक्षता पर आधारित स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे के सिद्धांतों की रक्षा की सख़्त आवश्यकता है, हम क्यों मंदिर-मस्ज़िद के नाम पर इन मूल्यों का तिरस्कार करते चले आ रहे हैं।

मुसलमानों के सामने भी यह प्रश्न रखा जाना ज़रूरी है कि क्या सैंकड़ों साल पहले अस्तित्व में आए इस्लामिक सोच-विचार, मूल्यबोधों को आधुनिक समाज की रोशनी में दफ्न नहीं हो जाना चाहिए था। क्या एक ऐसी शक्ति जिसके अस्तित्व का कोई प्रमाण दुनिया में नहीं है के नाम पर वे हमेशा अपने आप को दकियानूसी बनाए रखेंगे, क्या वे शरीयत के नाम पर हमेशा व्यापक सामाजिक हितों एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों से दूरी बनाए रखेंगे। क्या उनका धार्मिक कठमुल्लापन वर्तमान सामाजिक प्रतिबद्धताओं से उन्हें विमुख नहीं करता, जबकि एक देश का अभिन्न हिस्सा होने के कारण उन्हें भी व्यापक समाज के एक अभिन्न अंग की तरह पेश आना चाहिए!

सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के लोगों के सम्मुख यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि एक राष्ट्र के अभिन्न अंग के तौर पर समाज वे अपनी क्या भूमिका आंकते हैं। चाहे हिन्दु हों या मुसलमान या और कोई बिरादरी, आधुनिक प्रजातांत्रिक मूल्यबोधों का तकाज़ा है कि हम अपने व्यक्तिगत धार्मिक पूर्वाग्रहों को ताक पर रखकर मानव के रूप में अपने समय में जीना सीखें। बेशक एक बेहतर आज के लिए कल से सबक लिया जाना जरूरी है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरातन की अर्थी अपने कांधों पर रखकर अपने वर्तमान के सच को पैरों तले रोंदा जाए। हिन्दुओं-मुसलमानों और सभी धर्म सम्प्रदाय, जाति, भाषा, के लोगों को यह समझना जरूरी है कि परम्परा के नाम पर उनके ऊपर लादकर रखे गए ये लबादे उनकी मनुष्य के रूप में पहचान पर हावी होते जा रहे हैं। वे अपनी मानवीय विशेषताओं से नीचे गिरकर पशुवत होते चले जा रहे हैं।

यह नष्ट-भ्रष्ट हो चुका पूँजीवादी समाज है। मोहम्मद हो या राम, या और कोई पैगम्बर या अवतार, कोई भी इस पूँजीवादी समाज की बुराइयों, विडंबनाओं से निबटने में इन्सान की मदद नहीं कर सकता। चूक चुके मूल्यों के आधार पर आधुनिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। हम शोषण पर आधारित मानव संबंधों की सामाजिक संरचना का शोषित-पीड़ित हिस्सा हैं। हमारी एकता शोषक शासक वर्ग के लिए खतरनाक होती आई है और आगे भी रहेगी, इसलिए हम हिन्दु या मुसलमान या अन्य कुछ बनाकर रखे जाते हैं। इसलिए हम परम्परा और संस्कृति के नाम पर राम या पैगम्बर मोहम्मद के अनुयाई के रूप में प्रचारित किये जाते हैं। यह शोषक-शासक वर्ग हमें जात-पात-धर्म सम्प्रदाय की बेड़ियों में जकडे़ रखकर, हमारे बीच आपसी संघर्ष को भड़काकर, उसे पाल-पोसकर हमें आपस में उलझाए रखता है। यह वह ताकत है जो नहीं चाहती कि इन्सान धर्मनिरपेक्षता आधारित स्वतंत्रता, समानता भाईचारे के मूल्यों को सही मायने में समझ पाएँ जिन्हें एक दिन धर्म की सत्ता को नेस्तोनाबूद कर हासिल किया गया था।

आज के दिन के लिए इससे बड़ा सबक दूसरा कोई हो नहीं सकता कि हम अपने अस्तित्व की धार्मिक, जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई पहचान को अपने अन्दर दफ्न कर उस व्याधि से मुक्ति पाएँ जो एक मनुष्य के रूप में हमारी एकता में बाधक है और एक व्यापक सामाजिक प्रतिबद्धता में बंधकर एक राष्ट्र में तब्दील होने के संघर्ष में उतरें और क़ातिलों से, चाहे वे हिन्दु हो या मुसलमान, मंदिर-मस्ज़िद के बहाने हजारों बेगुनाहों के क़त्लेआम का जवाब माँगें।

10 टिप्‍पणियां:

  1. 1) यदि उनका अस्तित्व था भी तो... (यानी आपको भी शक है?)
    2) पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजा की स्तुति-अंधभक्ति का आज इक्कीसवी शताब्दी में क्या औचित्य है यह समझ से परे है... (एक राजा की अंधभक्ति? - यानी हजारों राजाओं की तरह राम सिर्फ़ एक राजा थे?)
    3) हम क्यों आस्था के बहाने उस एक नाम को ढोते चले जा रहे हैं? (आस्था के बहाने "एक नाम" को ढोना)

    "वामपंथी कुतर्क" और खामखा की लफ़्फ़ाजी हाँकने की अच्छी कोशिश की है आपने… लेकिन इतिहास में सैकड़ों चोट खाये हुए हिन्दू किसी से उपदेश सुनने के मूड में नहीं हैं, किसी तरह की नसीहत सुनने की इच्छा भी नहीं है क्योंकि नसीहत-उपदेश-लेक्चर सिर्फ़ उन्हें ही सुनाये जायें, जिन्होंने गलतियाँ की हैं…। हिन्दुओं को तो अभी जागृत करने का "प्रयास" भर किया जा रहा है… हिन्दू कभी गलत हो नहीं सकता, वह सिर्फ़ प्रतिकार करने की कोशिश कर रहा है…। इसलिये हिन्दुओं को छोड़कर सारी सलाह-उपदेश-नसीहत-लेक्चर आदि बाकियों को दीजिये… शायद तब स्थिति में ज्यादा जल्दी सुधार होगा… :)

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  2. मकतल में न मस्ज़िद न खराबान में कोई
    हम किस की आमनत में गम-ए-कार-जहाँ दें
    शायद कोई उनमें से कफन फाड़ के निकले
    अब जाएँ शहीदों की मजारों पे अजा़ दें।

    नारदमुनि

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  3. सटीक और एकदम बैलेंस्ड विश्लेषण. पर, धर्मांधों को कुछ कभी समझ आएगा भी? शायद नहीं!

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  4. रवि रतलामी जी ने सुरेश चिपलूनकर से कुछ पूछा है।

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  5. रविरतलामी पुछेंगे तो जवाब मैं अच्छी तरह से दे सकुंगा. देना हो तो बताना.

    रही बात धर्मान्धता की तो कौन नहीं जानता जगत किसकी धर्मान्धता को भूगत रहा है.

    धर्म को धिक्कारने वाले वामपंथियों के ईसाई मिशनरियों से गठजोड़ भी जगजाहिर है.

    हिन्दुओं को भाषण की जरूरत नहीं.

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  6. आस्‍था के आगे तर्क ठहर नहीं सकता हैा लेखक ने करोडों हिन्‍दुओं की आस्‍था का मजाक उडाने के कोशिश की है. हिन्‍दु सब कुछ माफ कर देते है इसी कारण ऐसा हो रहा हैा उन्‍हें अपनी यह आदत बदलनी पडेगीा भारत में रह कर कोई राम के अस्तिव पर सवाल उठाये हंसी आती है ऐसी मानसिकता पर ा लेखक को पागलखाने में होना चाहिएा

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  7. `धर्मांधों को कुछ कभी समझ आएगा भी? शायद नहीं!`

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  8. british samrajyvaad k agento ko hajaro saal pehle khaye hue jootey yaad aate rehte hain unki kund buddhi mein ajaad bharat aur uska samvidhaan yaad nahi rehta hai unko ye bhi itihas ki ghatna yaad nahi hai ki bharat 1947 se pehle uska koi sanghiy svaroop nahi tha patna ka aadmi jab bhuneshvar railway station par utre aur vahan kaling nivashi koi vyakti uske do kantaap maar de aur kahe paatliputr k raja ashok ne kaling vijay k dauraan hajaro logo ka narsanhaar kiya tha . itihaas se acche sabak liye jaate hain . jootey khane ki ghatnao ko raddi ki tokari mein daal diya jaata hai manav sabhyata k vikas k kram mein bahut saari uthal puthal hui hain itihas k adhaar par aaj badla lene ki baat karna murkhtapoorn hai murkhon ka ilaaj jootey se hi hota hai. is desh k andar ek dhara aisi hai ki jiska is desh ki aajaadi ki ladai mein koi yogdaan nahi tha aur vah log is desh ki ekta aur akhandta ko chinn bhinn karne k liye american samrajyvaad k ishare par tarah-tarah ki afvaahbajiyaan aur kuchakr rach rahe hain joota shabd istemaal kiya gaya hai uska tatpary shabdik nahi hai yah log jinke agent the voh makhmali joote marte the isliye chot nahi lagti thi .

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  9. पागलखाने में लेखक को नहीं पूँजीशाहों के फासिस्ट एजेंटों को होना चाहिए जो चिपलूनकर और बेंगाणी जैसे बुद्धिजीवियों की शक्ल में देश में साम्प्रदायिकता का ज़हर फैलाकर, आम जनता की एकता को नष्ट करके पूँजीशाहों का काम आसान करते हैं। एक ईमानदार आदमी को अपने आप को हिन्दु-मुस्लिम की तरह नहीं देखना चाहिए क्योंकि मानव समाज का इतिहास हिन्दु-मुस्लिमों की उत्पत्ति से लाखों साल पहले बल्कि ईश्वर की उत्पत्ति से भी काफी पहले से प्रारंभ होता है राम या मोहम्मद के ज़माने से नहीं। रहा सवाल वामपंथी कुतर्क का तो वे चिंता ना करें यहीं इसी ब्लाॅग पर हम वामपंथियों की भी पोल खोलने वालें हैं। आम-जनता को बेवकूफ बनाने में ये वामपंथी तुम दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक लोगों से कम थोड़े ही हैं।

    दृष्टिकोण

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  10. भारत की उस 'प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना' का व्याख्यान बताइए जिसमें राजा राम, गोप राजा कृष्ण और भोगी जोगी शिव न हों।
    वाकई इन सबसे विहीन 'प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना' कैसी होगी, मुझे जानने की उत्सुकता है।..
    मार्क्स दादा और उनके चेले तो हरगिज नहीं चलेंगे। गोलवलकर वगैरह भी नहीं चलेंगे। कांग्रेसी भी नहीं चलेंगे... नहीं चलने वालों की लिस्ट लम्बी है। ...

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