शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

क्रिसमस प्रसंग-धर्म को कूडे़दान में डाल दो.......


दुनिया भर में धार्मिक कपोल कल्पनाओं का कोई अन्त नहीं है। उन्हीं में से एक है ईसा मसीह का जन्म। आज 25 दिसम्बर को सारी दुनिया के ईसाई लोग मध्ययुग के एक तथाकथित ईश्वर-अवतार ईसा मसीह का जन्मदिन बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं, जिनका जन्म स्त्री-पुरुष के दैहिक संसर्ग, गर्भधारण, प्रसव इत्यादि तमाम अनिवार्यताओं से मुक्त ईश्वर के आशीर्वाद मात्र से हुआ था। कहने की ज़रूरत नहीं कि वर्जिन मेरी की तरह ही आज भी हमारे देश में कई कुँवारी माताएँ (अवैध यौनाचार, बलात्कार इत्यादि की शिकार होकर) नवजात शिशुओं को जन्म देती हैं, परन्तु उनमें से अधिकांश कचरे के ढेर पर डले मिलते हैं या गला घोटकर नाले में फेंक दिये जाते हैं। आज यदि किसी ऐसे बच्चे को ईश्वर का अवतार प्रचारित किया जाए तो हम में से कोई यह मानने का तैयार नहीं होगा।

आज के इस वैज्ञानिक युग में भी करोड़ों लोग ना केवल ईसामसीह के जन्म से जुड़ी इस झूठी कहानी पर विश्वास करते हैं बल्कि दुनिया के उद्भव के संबंध में बायबल में उल्लेखित भ्रामक और कल्पित अवधारणाओं को, अथक परिश्रम एवं संघर्षों से हासिल की गई वैज्ञानिक उपलब्धियों के ऊपर तरजीह देते हैं। करोड़ों वर्षों की प्रकृति, जीव जगत व मानव समाज की विकास यात्रा के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई इस दुनिया के निर्माण की, बायबल में उल्लेखित सात दिवसीय कहानी पर आज भी जब दुनिया के कई पढ़-लिखे विद्वानों को विश्वास व्यक्त करते हुए देखा जाता है तो आश्चर्य ही नहीं दया भी आती है।

इस ईसाई धार्मिक अन्धता, जिसका विरोध करते हुए योरोप में वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न कई दार्शनिकों ने अपनी जान गँवाई है, को नज़रअन्दाज करते हुए यदि तत्कालीन परिस्थितियों पर नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि ईसामसीह एक ऐसे दौर में जननेता के रूप में उभरकर आए व्यक्तित्व थे जब तत्कालीन मध्ययुगीन कबीलाई समाज बेहद अराजक ढंग से जीवनयापन करता था, और बहुईश्वरवाद से ग्रस्त एक दूसरे के खून का प्यासा हुआ करता था। ईसा मसीह ने एकेश्वरवाद के विचार को इन अराजक लोगों में रोपते हुए तमाम कबीलों को एकजुट किया और ईश्वर की कल्पना के इर्दगिर्द एक विशेश नीति-नैतिकता में बाँधना प्रारंभ किया, कालान्तर में जिसे ईसाई धर्म के रूप में आत्मसात किया गया। विज्ञान एवं दर्शन के विकास के अभाव में इससे बड़ी सामाजिक गतिविधि की उम्मीद उस युग में नहीं की जा सकती थी। परन्तु, आज के युग में जब विज्ञान अपने चरम पर है, ना केवल ईसाई धर्म के अनुयाइयों की अंधभक्ति आश्चर्य पैदा करती है बल्कि इसके विभिन्न धड़ों, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट इत्यादि-इत्यादि का आपसी मतभेद एवं वैमनस्य भी हतप्रभ करता है। जिस ईसा मसीह ने तत्कालीन कबीलाई समाज को संगठित किया आधुनिक ईसाइयों ने उसे कई हिस्सों में बाँट लिया और वे सब बेशर्मी से ईसामसीह के जन्मदिन की खुशियाँ भी मनाते हैं।

कोई भी धर्म एक समय विशेष में अपना काम सम्पन्न करने के पश्चात अप्रासंगिक हो जाता है। ज्ञान-विज्ञान की सच्चाइयों को नज़रअन्दाज करके धार्मिक कार्यवाहियों के ज़रिए पुरानी लकीर को पीटते रहना दरअसल जाने-अन्जाने समाज को पीछे खीचना ही है जो कि मानव समाज के लिए बेहद घातक है। इस सच्चाई को ईसाई धर्म ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के अनुयाइयों को समझने की ज़रूरत है। धर्म को दरअसल कूड़ेदान में डाल देने की ज़रूरत है ताकि एक बेहतर मानव समाज बनाया जा सके।


6 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे उनकी कहानी पर तो यकीन नहीं, लेकिन ईसा मसीह के कुछ अनुयायियों से नरफत सी हो गई है, उन्होंने तो उसकी माँ को भी नकार दिया, जिसने ईसा मसीह को जन्म दिया। मैं ईसा का सत्कार करता हूं, उसने लोग भलाई के काम किए, लेकिन कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उसके नाम का इस्तेमाल किया है केवल।
    माँ

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  2. सभी धर्मों में तमाम तरह की अवैज्ञानिकता भरी पड़ी है, इसी लिए धर्म गुरू विज्ञान के विरोधी रहें हैं, आखिर दुकनदारी का सवाल है.

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  3. विज्ञान एवं दर्शन के विकास के अभाव में इससे बड़ी सामाजिक गतिविधि की उम्मीद उस युग में नहीं की जा सकती थी। isi samajik gatividhi ko aaj tak celebrate kiya ja raha hai to usme dikkat kya hai? vahi yug tha jab vergin merry kahkar unki santaan ko gale lagaya gaya. aaj ke baare mein to aapne likha hi hai.

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  4. aise 2 andh vishvash or bhi bhut failaye ja rhe hai jaise bolgvani men hi islam ko vigyan smmt sidh kiya ja rha hai
    aap ne schchi prkt ki hai main aap ko sadhuvad deta hoon
    dr. ved vyathit

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    "कोई भी धर्म एक समय विशेष में अपना काम सम्पन्न करने के पश्चात अप्रासंगिक हो जाता है। ज्ञान-विज्ञान की सच्चाइयों को नज़रअन्दाज करके धार्मिक कार्यवाहियों के ज़रिए पुरानी लकीर को पीटते रहना दरअसल जाने-अन्जाने समाज को पीछे खीचना ही है जो कि मानव समाज के लिए बेहद घातक है। इस सच्चाई को ईसाई धर्म ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के अनुयाइयों को समझने की ज़रूरत है। धर्म को दरअसल कूड़ेदान में डाल देने की ज़रूरत है ताकि एक बेहतर मानव समाज बनाया जा सके।"

    सहमत, पर धर्मभीरुओं से भरे जमाने में यह आग्रह सुनने वाले हैं ही कितने ?

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