गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कोपेनहेगन सम्मेलन‍ - आम जन साधारण के स्वार्थ की बलि

जोर-शोर से शुरु हुआ कोपेनहेगन सम्मेलन, जैसा कि अंदेशा था पूँजीवादी स्वार्थों की भेंट चढ़कर बेनतीजा खत्म होने की कगार पर आ पहुँचा है। दुनियाभर के देशों के जमावड़े के बीच इक्का-दुक्का मुल्क ही ऐसे दिखाई दिए जिनकी चिंताएँ वास्तव में उनके देश के जन-साधारण के अस्तित्व की लड़ाई से उत्प्रेरित प्रतीत हो रहीं थीं, अन्यथा अधिकांश देश अपने-अपने मुल्कों के पूँजीपतियों की चिंताओं को ही ढोते नज़र आए।

मालदीव के प्रतिनिधि का उद्गार-‘SIRVIVAL IS NOT NIGOTIABLE’ ना केवल मालदीव के आम जनसाधारण के जीवन पर आसन्न संकट के प्रति गहरी चिंता को अभिव्यक्त करता हैं, बल्कि एक तरह से यह वाक्य सारी दुनिया के जलवायु परिवर्तन से पीड़ित आम जनसाधारण की आवाज को भी अभिव्यक्ति देता सा लगता है।

अधिकांश विकासशील देशों ने, जिनसे उम्मीद थी कि वे प्रजातांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने-अपने देशों की पर्यावरण एवं आम जनता के हित में कार्बन उत्सर्जन में आवश्यक कटौती की जरूरत को शिद्दत से महसूस करते हुए स्वेच्छा से कटौती का हलफ उठाऐंगे, बेहद बेशर्मी से एकजुट होते हुए अपने देश के शोषक पूँजीवादी तंत्र की आवाज़ को ही अभिव्यक्त किया है।

इस बात पर ताज्जुब जताया जा सकता है कि कैसे उन ताकतवर साम्राज्यवादी देशों (जिनके टुकड़ों पर अधिकांश तथाकथित विकासशील देश पलते आ रहे हैं) के खिलाफ, उनसे दुश्मनी मोल लेते हुए उनके इरादों को ध्वस्त किया जा सका। मगर अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के मद्देनज़र यह ज़्यादा आश्चर्य की बात नहीं है। मौजूदा समय में भारत, चीन जैसे शक्तिशाली पूँजीवादी अर्थ व्यवस्था वाले देश विकसित साम्राज्यवादी देशों को टक्कर देने की स्थिति में आ चुके हैं और इसका निहितार्थ यह भी है कि वे खुद आर्थिक रूप से साम्राज्यवादी चरित्र को प्राप्त कर चुके हैं। कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर कोपेनहेगन में उभरकर आया द्वन्द्व दरअसल बड़ी साम्राज्यवादी व्यवस्थाओं और लगातार ताकतवर होती जा रही पूँजीवादी व्यवस्थाओं का द्वन्द्व है जिसमें बड़े ताकतवर देश, ताकतवर होते जा रहे दूसरे देशों के ‘पर’ कतरने की कोशिश में हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि साम्राज्यवादी देशों द्वारा थोपे जा रहे प्रतिबंधों के बहाने विकासशील देशों द्वारा अपनी जिम्मेदारी से भागने की इस मुहीम का नेतृत्व करने वालों में हमारा देश भी शामिल है जबकि जलवायु परिवर्तन से होने वाले समुद्र स्तर में वृद्धि से हमारे देश के कई शहर और गाँव जलमग्न होने वाले हैं और वहाँ के आम जनसाधारण के जीवन का प्रश्न भारत के पूँजीपतियों के मुनाफे में कटौती के प्रश्न से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, एक ताकतवार जनआंदोलन की अनुपस्थिति में जिसे दरकिनार कर दिया गया है।

किसी भी सही प्रजातांत्रिक व्यवस्था के नुमाइन्दों का यह कर्तव्य है कि वह जलवायु परिवर्तन से आम जनसाधारण एवं पर्यावरण पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आने वाले संकट के मद्देनज़र कार्बन उत्सर्जन अथवा अन्य बंदिशों के पक्ष में प्रतिबद्धता का दृढ संकल्प लेते हुए, बड़े साम्राज्यवादी देशों को भी इस संकल्प में शामिल होने के लिए मजबूर करें मगर वर्तमान में सम्मेलन जिस दिशा में जा रहा है उससे यही लग रहा है कि पहली बार इतने बड़े स्तर पर किसी NOBLE CAUSE के लिए एकत्र हुए मुल्कों को देखकर दुनिया के आम लोगों में जो उम्मीद जगी थी वह धूमिल होती जा रही है। पूँजीवादी स्वार्थों के आगे आम जनसाधारण का स्वार्थ बलि चढ़ता नज़र आ रहा है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे महत्वपर्ण आलेखों पर ब्लॉग जगत का कोई नोटिस ना लेना हतप्रभ करता है वर्ना फालतू की हीही-ठीठी पर ब्लॉगर टिप्पणियों का ढेर लगा देते है। इससे पता चलता है कि ब्लॉग जगत दिमागी रूप से कितना खोखला है।
    लगे रहो भाई साहब आप जो भी हैं, हम आपके साथ हैं।

    नारदमुनि

    उत्तर देंहटाएं