मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

जब ‘चोरों’ में ही चुनाव की अनिवार्यता हो तो आखिर शत-प्रतिशत मतदान से इस देश का भाग्य कैसे बदलेगा !

गुजरात में चुनाव में मतदान अनिवार्य किया गया है। यह सच है कि मौजूदा सरकारों के नकारा और जनविरोधी रवैये और मतदान में आने वाली कई अड़चनों परेशानियों के कारण कई सारे लोग वोट डालने में रुचि नहीं लेते है और अंततः तीस-चालीस प्रतिशत राजनैतिक रूप से मोटीवेटेड वोटरों के बीच पॉच-दस प्रतिशत वोटो के दम पर सरकारें बन जाती हैं । ये अल्पमत की सरकारें बहुमत पर बेशर्मी से राज करती हैं। हालाँकि यह राजनैतिक पार्टियों के लिए फायदे का सौदा है मगर प्रजातंत्र के लिए एक बेहद निराशाजनक स्थिति, फिर भी सिर्फ इस वजह से हंटर से हाँककर जबदस्ती वोट डलवाने की प्रक्रिया को किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। यह सरासर एक नादिरशाही रवैया है।

मतदान को अनिवार्य कर दिये जाने का सीधा मतलब है एक और फासीवादी कानून बनाकर डंडे के दम पर नागनाथ या साँपनाथ को जबरदस्ती चुनवाकर जनता के सिर पर बिठाया जाना। मौजूदा चुनाव प्रक्रिया की यह विडंबना है कि चंद गुंडे-बदमाश, डाकू-लुटेरे, बेईमान-दलाल और भ्रष्ट किस्म के लोग अपने आपको हमारे नेता के रूप में पेश करते हैं और हमें इन असामाजिक तत्वों को चुनने की मजबूरी से दो-चार होना पड़ता है। दिन पर दिन कम होते जा रहे मतदान प्रतिशत् के कारण तंत्र की निगाहें मतदान ना करने वाले मतदाताओ पर तो वक्र हो रही है परन्तु हमारे इन तथाकथित ‘अगुओं’ को जो कि अपनी स्थार्थपरता एवं लोभी प्रवृति के कारण अब बस जूते खाने लायक रह गए हैं, उन्हें सुधारने की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। इस स्थिति में मतदाता यदि जानबूझकर अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करता है तो कौन सा अपराध करता है। मतदान अनिवार्य किये जाने की वकालत करने वालों को इस बात का भी जवाब देना चाहिये कि जब ‘चोरों’ में ही चुनाव की अनिवार्यता हो तो आखिर शत-प्रतिशत मतदान से इस देश का भाग्य कैसे बदलेगा!

इस मुद्दे को एक दूसरे नज़रिए से भी देखने की आवश्यकता है। सत्ता कब्जाए रखने के लिए अंग्रेजों ने जन्म दी, फूट डालो राज करो की नीति पर कायम रहते हुए पिछले बासठ सालों में आई-गई सभी राजनैतिक पार्टियों की सरकारों द्वारा देश की जनता को जात-पात, धर्म-प्रांत भाषा-सम्प्रदाय के नाम पर लगातार विखंडित किया जाता रहा है। किसी ने सोचा तक न था कि विखंडन का यह सिलसिला बहुत दूर तक जाकर इतनी भयानक व्यक्तिवादी मानसिकता पनपा देगा कि लोग सामाजिक स्वार्थ को भी ताक पर रख देंगे। सत्ता पर काबिज बने रहने के लालच में सत्ताधारी ताकतों द्वारा जाने-अनजाने पूरे देश का जन-मानस कर्तव्य एवं जिम्मेदारी की भावना से दूर कर दिया गया। परिणामस्वरूप, लम्बे सामाजिक संघर्ष के बाद राजनैतिक प्रणाली के तौर पर उपजी चुनावी प्रक्रिया के प्रति देश की अधिकांश जनता गैर जिम्मेदाराना मानसिकता से ग्रसित होती चली गई।
सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का एक दूसरे से समन्वयविहीन पृथक-पृथक रूप से परिचालित होते रहने की वस्तुगत परिस्थिति, जिसे पूँजीवादी सत्ता ने अपने पक्ष में एकतरफा इस्तेमाल किया, ने भी आम जन-साधारण को सामाजिक चेतना के स्तर पर निष्क्रीय किया है। इसी कारण राजनैतिक स्तर पर जनविरोधी कार्यव्यापार, व्यापक भ्रष्टाचार एवं अनैतिक गतिविधियों के बावजूद आम जन साधारण की ओर से किसी प्रकार की कोई सचेत प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। इसलिए मतदान अनिवार्य करने जैसी अवधारणा का समर्थन करने की बजाय ज्यादा जरूरी यह लगता है कि सामाजिक राजनैतिक शक्तियाँ एक व्यापक पुनर्जागरण आन्दोलन का सूत्रपात करें जिससे ना केवल चुनाव जैसी सामाजिक गतिविधियों में स्वार्थी एवं भ्रष्ट समाज विरोधी तत्वों को दूर रखा जा सके साथ ही सामाजिक गतिविधियों से दूर हो गये लोगों को सहज स्वयंस्फूर्त तरीके से जिम्मेदारी की भावना के साथ चुनाव को एक अनिवार्य सामाजिक गतिविधि के तौर पर सम्पन्न कराने की भूमिका निभाने का मौका मिल सके।
आम जनसाधारण को भी इस बात को समझना आवश्यक है कि हम एक सामाजिक प्राणी हैं और यह राजनैतिक तंत्र समाज विरोधी ताकतों द्वारा हथियाकर अपने पक्ष में इस्तेमाल किया जा रहा है । इस स्थिति में हम अपने आप को तटस्थ रखकर, चुनाव प्रक्रिया में भाग ना लेकर, चुनाव का बहिष्कार करके इन समाज विरोधी शक्तियों को ही मजबूत बना रहे हैं। हमें यदि इस चुनाव प्रक्रिया में ही कोई खोट लगता है, जो कि है ही, तो इसे बदलने के लिए सामाजिक रूप से संगठित एवं सक्रिय होने की ऐतिहासिक अनिवार्यता सम्मुख है, इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। आज की महती आवश्यकता यह है कि चुनाव प्रक्रिया को आमूल-चूल बदल दिया जावे और उन सब खामियों को दूर किया जाए जिससे समाज के वास्तविक सर्वमान्य नेताओं, प्रगतिशील एवं रचनात्मक मानसिकता के लोगों, निस्वार्थ सामाजिक-राजनैतिक शक्तियों का ही चुनाव सुनिश्चित किया जा सके, ताकि विगत 62 वर्षों से कीचड़ में धंसे इस देश को बाहर निकालकर धोया-पोछा जा सकें।

4 टिप्‍पणियां:

  1. तुगलक़ी फरमान है और क्या? बजाए इसके नेताओ पर पाबंदी लगाते उनके लिए के अनिवार्य करते कि अपने इलाक़े मैं जाकर लोगो की परेशानिया सुने, उनका हाल सुने, नही बस चला दिया डंडा पब्लिक पर.... वोट ना डालने पर सज़ा क्या है ?
    मरे को मारे शाह मदार,

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  2. शायद आपने विधेयक का मसौदा जाने बगैर पोस्ट लगा दी है.

    पहली बात, इस विधेयक में नकारात्मक मतदान अर्थात "इनमे से कोई नहीं" का विकल्प दिया गया है. आप नागनाथ या सांपनाथ को चुनने के बजाये "इनमे से कोई नहीं" विकल्प का प्रयोग कर सकते हैं.

    दूसरी बात, यह परीक्षण के तौर पर केवल स्थानीय निकाय चुनावों तथा ग्राम पंचायत चुनावों में लागू किया गया है.

    यह चुनाव सुधारों की दिशा में एक सकारात्मक पहल है जो स्वागत योग्य है.

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